विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ३१ ) इस तरह से किसी अवर्णनीय, अविज्ञेय अवस्था (स्वातन्त्र्य शक्ति) को ही शाक्त और शैव मत में शून्यता माना गया है । इसका विवरण १२४वें श्लोक की व्याख्या में विमर्शदीपिका१ के और १३१वें श्लोक की व्याख्या में चन्द्रज्ञान२ के प्रमाण पर विस्तार से किया गया है । १५१वें श्लोक की व्याख्या में परा देवी को निरावरण भगवती प्रज्ञा पारमिता कहा गया है । प्रज्ञा पारमिता स्वरूप शून्यभूमि का ही इस विज्ञानभैरव तन्त्र में परमशिव ने परा शक्ति के रूप में सर्वत्र उपदेश किया है। ११० धारणाओं के प्रतिपादक प्रत्येक श्लोक के चतुर्थ चरण में परा देवी का निष्कल स्वरूप आलोकित हो उठता है । बौद्ध दर्शन में इस शून्यभूमि को ही मोक्ष मान लिया गया है, किन्तु यह स्मरण रखना चाहिये कि इस ग्रन्थ में परा शक्ति को शिवस्वरूप की प्राप्ति के लिये मुख (द्वार) माना है । इस विषय का विवेचन पहले किया जा चुका है । शून्यषटक ३२वें श्लोक में शून्यषट्क की और ४४वें श्लोक में शून्यत्रय की भावना का विधान है । स्वच्छन्दतन्त्र (४।२८९-२९६) और योगिनीहृदय (३।१७७-१७८) में शून्यषट्क का विवरण मिलता है । ३२वें श्लोक की व्याख्या में योगिनीहृदयदीपिका के अनुसार हीं बीज में छः शून्यों की स्थिति का विवरण दिया जा चुका है । दीपिकाकार ने बताया है कि छः शून्यों का स्वरूप विज्ञानभैरव के ३२वें श्लोक से जानना चाहिये । स्वच्छन्दतन्त्र में पहले ऊर्ध्व शून्य, अधः शून्य और मध्य शून्य ये तीन शून्य प्रतिपादित हैं । ४४वें श्लोक की टीका में उद्धृत वासुदेव के वचन में भी ये ही तीन शून्य गिनाये गये हैं । क्षेमराज ने नादान्त पर्यन्त समस्त पाशों के क्षय के कारणभूत शक्ति पद को ऊर्ध्व शून्य, हृदय को अधः शून्य और कण्ठ, तालु, भ्रूमध्य, ललाट, ब्रह्मरन्ध्र को मध्य शून्य माना है । व्यापिनी में चतुर्थ, समना में संमत शून्य का लक्षण बताने वाला यह श्लोक शिवोपाध्याय द्वारा उद्धृत है (पृ० ११०) । नील-पीत, घट-पट प्रभृति बाह्य और सुख-दुःख प्रभृति आन्तर पदार्थों को आलम्बन धर्म कहा जाता है । योगसूत्र (२।३) में अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश—ये सब क्लेश माने गये हैं । क्लेशाशय का तात्पर्य इन्हीं के संस्कारों (वासनाओं) से है, जो कि चित्त में संचित रहते हैं । योगसूत्र (१।२४) में ही ईश्वर को क्लेश, कर्म, विपाक और आशय से मुक्त माना है । १. तान्त्रिक साहित्य (पृ० ५९६) में शिवोपाध्याय कृत विज्ञानभैरव की टीका का नाम विमर्शदीपिका बताया गया है । शिवोपाध्याय ने विज्ञानभैरव की अपनी टीका (पृ० ११०-१११) में विमर्शदीपिका का नाम लेकर ये श्लोक उद्धृत किये हैं । अतः विमर्श- दीपिका इससे भिन्न एक स्वतन्त्र ग्रन्थ है । २. चन्द्रज्ञान और चन्द्रज्ञानविद्या के परिचय के लिये नित्याषोडशिकार्णव का उपोद्घात (पृ० २६-२७) तथा तान्त्रिक साहित्य (पृ० २०४-२०५) देखिये ।