भारतकोश
विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)

विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)

Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary

महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished493 पृष्ठ

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( ७८ ) भाषा जिस कामुक के समान राजा के (व कामिनी के समान डाहलोर्वी के) अत्यधिक युद्ध से या कलह से कर्ण राजा के मरने पर या कान के कट जाने पर हाथी दांत के बने हुवे कान के आभूषण के समान श्वेत कीर्ति अभी भी डाहलदेश को नही प्राप्त हो रही है । (कान कट जाने से कर्ण भूषण पहनने का सौभाग्य ही अप्राप्य हो जाता है। कर्ण राजा के ऐसे प्रतापी राजा के मर जाने से कीर्ति कहां से आ सकती है) । यस्यासिरत्युच्छलता रराज धाराजलेनेव रणेषु धाम्ना । दृप्तारिमातङ्गसहस्रसङ्गामभ्युक्ष्य गृह्णन्निव वैरिलक्ष्मीम् ॥१०४॥ अन्वयः यस्य असिः रणेषु अत्युच्छलता धाराजलेन इव धाम्ना दृप्तारिमातङ्ग सहस्रसङ्गां वैरिलक्ष्मीम् अभ्युक्ष्य गृह्णन् इव रराज । व्याख्या यस्य भूपतेरसि खडगो रणेषु युद्धेष्वत्युच्छलतोर्ध्वं गच्छता धाराजलेन खड्ग- धाराजलेनेव धाम्ना तेजसा, दृप्ता मदान्धा अरिमातङ्गा शत्रुहस्तिनो विपक्ष- चाण्डालाश्च तेषा सहस्र तस्य सङ्ग सत्तर्गो यस्या सा तां वैरिलक्ष्मीं शत्रुश्रिय मभ्युक्ष्य प्रक्षाल्य 'उक्ष् सेचने' इत्यस्माद्धातोर्भुपसर्गान्त्ययभ्युक्ष्येतिनिष्पन्नम् ।' गृह्णन्निवाऽऽसादयन्निव रराज शुशुभे । यथा चाण्डालसङ्गादशुद्ध वस्तु जलेन संप्रोक्ष्य शुद्ध विधाय गृह्यते तथैवाऽत्राऽवि मातङ्गसहस्रसङ्गजनिताशुद्धियुक्ता वैरिलक्ष्मी धाराजलेन पवित्रीकृत्य गृहीता । धाराजलेन सह धाम्नरसादृश्यप्रती तिरित्युपमा । मातङ्गशब्देन गजाना चाण्डालनाञ्चप्रतीत्या श्लेषोऽलङ्कार । खड्गे वैरिलक्ष्मीकर्मकग्रहणक्रियाया उत्प्रेक्षणादुत्प्रेक्षा । अतस्तेषा सङ्कर । भाषा जिस राजा की तलवार, युद्धा म ऊपर उठने वाले अपनी धार के जल के समान तेज से मदोन्मत्त हजारो शत्रुरूपी हाथियो के अथवा हजारो शत्रु चाण्डालो के ससर्ग दोष से अपवित्र शत्रुओ की लक्ष्मी का मानो प्रोक्षण कर ग्रहण करती हुई शोभित हुई । अर्थात अपवित्र शत्रुलक्ष्मी पर अपनी तेज धार का पानी छिड़क, उसे पवित्र कर उसका ग्रहण किया । (अपवित्र वस्तु पर गङ्गाजल छिड़क कर पवित्र करने की परिपाटी है) ।