भारतकोश
विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)

विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)

Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary

महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished493 पृष्ठ

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लोहितास्रमतक्षतजशोणितम्' इत्यमर । शोणा रक्ता देहा येषा ते रुधिरस्तद्देहैः शोणाश्मभी रक्तवर्णपाषाणै समुद्रादस्तलस्थितैस्तद्दर्शनव्याजेनेत्यर्थ. । अभीक्ष्णं शश्वत् 'युक्ते द्वे साम्प्रत स्यान्नेऽभीक्ष्ण शश्वदनारते' इत्यमर । क्षोभात् दुखात रघुराजस्य रामस्य बाणास्तेषा तत्प्रहारजनिता जीर्णा पुरातना व्रणा. क्षतास्तेषा स्फोट विघटनमाचचक्ष इव संदर्शयामासेवेत्यर्थ । रामचन्द्रबाण- जनितक्षता नाद्याऽपि गता अतो भवद्भिर्न बाणसंधान कार्यमिति प्रार्थयामासेति भाव । अत्र रक्तपाषाणेषु जीर्णव्रणस्फोटस्य संभावनादुत्प्रेक्षालङ्कार ।

भाषा मौर्वी चढे धनुष को लिय हुवे उस राजा को देखकर सतत दुख से समुद्र, अपने भीतर के रक्त के सदृश लाल रग के लाल पत्थरो के द्वारा मानो रामचन्द्र के बाणो के पुराने घाव फट रहे हो ऐसा दिखान लगा । अर्थात् रामचन्द्र के बाणो से भय घाव अभी तक भरे नही हे अब तुम बाण मत मारो ऐसी प्रार्थना करने लगा ।

राशीकृतं विश्वमिवायलोक्य वेलावने यस्य चमूसमूहम् । अम्भोविभूतेरपरिक्षयेण क्षारत्वमब्धिर्बहुमन्यते स्म ॥११०॥

अन्वयः अब्धिः वेलावने राशीकृतं यस्य चमूसमूहं विश्वम् इव अवलोक्य अम्भोविभूतेः अपरिक्षयेण क्षारत्वं बहुमन्यते स्म ।

व्याख्या अब्धि समुद्रो वेलावने तटारण्ये राशीकृतमेकत्रीकृत यस्य राज्ञश्चमूसमूह सैन्यसङ्घमेकत्रीभूत सम्पूर्ण विश्वमिव जगदिवाऽवलोक्य दृष्ट्वाऽम्भसो जलाना विभूते सम्पदोऽपरिक्षयेण वैरस्येन पानादिकर्मणि व्ययाभावात् क्षारत्व लवण- रसाधिक्यं बहुमन्यते स्म प्रशंसितवान् । अत्रापरिक्षयरूपकार्ये क्षारत्व कारण- मिति प्रशसाहेतु । सेनासमूहस्य विश्वेन सह साम्यादुपमालङ्कार ।

भाषा सम्पूर्ण जगत् एकत्रित हो गया है ऐसा दिखाई पडने वाले जिस राजा के सेनासमूह को अपने तट पर एकत्रित देखकर जलसम्पत्ति का जरा भी खर्च न

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