भारतकोश
विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)

विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)

Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary

महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished493 पृष्ठ

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( १०८ ) समये नीलोत्पलस्य विकासो दृश्यते न तु सूर्योदयानन्तरम्। अत्र विनोक्त्य- लङ्कारः। 'विनोक्तिर्यद्विनाऽन्येन नासाध्वन्यदसाधु वा'। भाषा राजा को संसार की समस्त अमूल्य वस्तुएँ सुलभ होने पर भी पुत्र के चन्द्रसदृश मुख को देखे बिना वह प्रात कालीन नीलकुमुद के सदृश दीन नेत्रों से युक्त था अर्थात् उदास रहा करता था। जैसे चन्द्रदर्शन बिना नीलकुमुद विकसित नही होता वैसे ही पुत्र दर्शन बिना राजा की आखें दीन थी। अर्थात् राजा उदास रहते थे। उवाच कण्ठागतबाष्पगद्गदैः पदैः कदाचित्सहधर्मचारिणीम्। सरस्वतीहारलतामिवोज्ज्वलां प्रकाशयन्दन्तमयूखचन्द्रिकाम् ॥२८॥ अन्वयः (सः)कदाचित् सरस्वतीहारलताम् इव उज्ज्वलां दन्तमयूखमाञ्झिकां प्रकाशयन् कण्ठागतवाष्पगद्गदैः पदैः सहधर्मचारिणीम् उवाच। व्याख्या सः नृपः कदाचित् सरस्वती वाणी वाग्देवता तस्या मौक्तिकनिर्मिता या हारलता तामिवोज्ज्वलां शुभ्रवर्णां दन्तानां रदनानां मयूखानां किरणानां 'किरणो- स्रमयूखांशुगभस्तिघृणिरश्मयः' इत्यमरः। चन्द्रिका ज्योत्स्ना 'चन्द्रिका कौमुदी- ज्योत्स्ना' इत्यमरः। तां प्रकाशयन् विस्तारयन् कण्ठे गले आगतानि यानि बाष्पाण्यूष्माश्रूणि 'बाष्पमूर्ध्माश्रु कशिपु त्वप्रमाच्छादनं द्वयम्' इत्यमरः। तैर्गद्ग- दैर्नातिस्पष्टमुच्चारितैः पदैः शब्दविन्यासैस्सहधर्मचारिणीं स्वपत्नीमुवाच। अत्रोपमालङ्कारः। भाषा किसी समय उस राजा ने सरस्वती की मोती की माला के समान दातों की शुभ्र किरणों की चादनी को प्रकाशित करते हुए, भरे गले से अपनी पत्नी से कहा। फलेन शून्यः सुतरां दुनोति मामयं गृहस्थाश्रमधर्मपादपः। विलोकयामि प्रतिबिम्बमात्मनः सुताभिधानं त्वयि नाधुनापियत्॥२६॥