भारतकोश
विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)

विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)

Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary

महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished493 पृष्ठ

पृष्ठ 155, कुल 493 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 155

( १३२ ) भाषा दूध के व्याज से अमृत के रस को रखने वाले उस रानी के स्तन रूपी सोने के घटो पर, ठंडक पहुँचाने के लिये लगाया हुआ सफेद चन्दन, अमृत को छानने के लिये घडो के ऊपर रक्खे हुए सफेद छत्रो (छतनों) की शोभा दे रहा था । नरेन्द्रपुत्रस्य कृते सुरक्षितं क्षितीशकान्ताकुचकुम्भयोः पयः । विलासहारोज्ज्वलमौक्तिकच्छलात् समल्लिकावासमिव व्यधीयत ॥६५॥ अन्वयः नरेन्द्रपुत्रस्य कृते क्षितीशकान्ताकुचकुम्भयोः सुरक्षितं पयः विलासहा- रोज्ज्वलमौक्तिकच्छलात् समल्लिकावासम् इव व्यधीयत । व्याख्या नरेन्द्रस्य नृपस्य पुत्र सूनुस्तस्य कृते क्षितीशस्य पृथ्वीपते कान्ताया प्रियायाः कुचावेव स्तनावेव कुम्भो घटौ तयोस्सुरक्षितं सुनिहितं पय दुग्ध विलासाय धारितश्चासौ हारश्च तस्योज्ज्वलाश्शुभ्राश्चते मौक्तिकाश्च तेषाञ्छलम्मिषेण विलासार्थधारितहारप्रोतशुभ्रमुक्ताफलव्याजेन मल्लिकापुष्पाणा 'मल्लिका शतभीरुश्च गवाक्षी भद्रमल्लिका । शीतभीरुम॑दायती भूपदी तृणशून्यकम्' इति वाचस्पति । वासस्तुगन्धस्तेन सहित युक्तमिति समल्लिकावासमिव व्यधीयत कृतम् । शुभ्रत्वान्मौक्तिकोपरि मल्लिकापुष्पत्वारोप । सुगन्धार्थं दुग्धोपरि मल्लिकापुष्पाणा स्थितिरिति भाव । अत्र सापन्हुवोत्प्रेक्षालङ्कारः । भाषा राजपुत्र के लिये रानी के स्तनरूपी घडो में सुरक्षित रक्खा हुवा दूध, शोभा के लिये पहने हुए हार के सफेद मोतियो के मिष से मानो सफेद बेले के फूलो की सुगन्ध से सुगन्धित किया गया था । मृगीदृशः श्यामलचूचुकच्छलात् कुचद्वये भूपसुतोपयोगिनि । प्रभास्रक्रान्तरसायनौषधी-दलद्वयं नीलमिव व्यराजत ॥६६॥ अन्वयः मृगीदृशः भूपसुतोपयोगिनि कुचद्वये श्यामलचूचुकच्छलात् नीलं प्रभाप्रस्रक्रान्तरसायनीषधीदलद्वयम् इव व्यराजत ।