भारतकोश
विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)

विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)

Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary

महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished493 पृष्ठ

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पृष्ठ 158

( १३५ ) पृथिव्यां विक्षेप दत्तवती। गर्भिण्यो मन्दगत्यैव चलन्तीति भावः। अत्रोत्प्रेक्षा- लङ्कारः। भाषा गर्भ के बोझ से धीरे २ चलने वाली, मृग के समान बडी २ आखो वाली रानी, मानो यह जान कर कि पृथ्वी का बोझ कम करने के लिये शरीर धारण करने वाला मेरा गर्भस्थ कुमार, मुझ स पृथ्वी का बोझ द्वारा पीडित होना कैसे सहन करेगा, पृथ्वी पर धीरे २ पावो को डालती थी। (गर्भिणी स्त्रियां प्राय धीरे २ ही चला करती हैं।) सशब्दकाञ्चीमणिखिम्बितैर्बभौ सखीजनैः साद्भुतगर्भधारिणी। उपास्यमाना कुलदेवतागणैः समन्ततो यामिकतां गतैरिव ॥७०॥ अन्वयः अद्भुतगर्भधारिणी सा सशब्दकाञ्चीमणिनिम्बितैः सखीजनैः समन्ततः यामिकतां गतैः कुलदेवतागणैः इव उपास्यमाना यभौ। व्याख्या अद्भुतश्चासौ गर्भश्च तं धारयतीत्यद्भुतगर्भधारिण्याऽऽश्चर्यदर्शितगर्भ- धारिणी सा रानी शब्देन सहिता सशब्दा सशब्दा चाऽसौ काञ्ची रशना तस्यां समुद्ग्रन्थिना मणयस्तासु प्रतिबिम्बितं प्रतिफलितं 'रत्नं मनिर्द्वयो रत्नजातौ मुक्तादिनेऽपि च' इत्यमरः । सखीजनैः समन्ततश्चतुर्दिक्षु यामिकतां प्राहरिवतां गतं सम्प्राप्तैः कुलस्य वंशस्य देवतागणैरिष्टदेवतासमूहैरिवोपास्यमाना संसेव्य- माना यभौ शुशुभे। यथा प्राहरिका सशब्द परितो गत्वा स्वकार्य कुर्वन्ति तथैव शब्दबद्धदानागतमणि-प्रतिबिम्बित-सखीजनरूप-कुलदेवतागणं समन्तत प्राहरिककार्य स्थित इति भावः । उत्प्रेक्षालङ्कारः । भाषा अद्भुत (भक्ति मार्ग) गर्भ को धारण करने वाली रानी झन झनाने वाली करधनी में जड़े हुए मणियो मे सखी जनों की परछाही पड़ने से मानो चारो ओर से फिरूंग २ कर पहरा देने वाली कुलकी इष्ट देवताओ से सेवित दिखाई पडती थी।