विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)
Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary
महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 188, कुल 493 में से
संदर्भ में पढ़ें( १६१ ) भाषा खेलते हुए, वेश्याओं के पैंजेव के शब्दों को सुनकर आए हुए राजहंस पक्षियों को भगा देने वाले उस बालक ने, सम्पूर्ण पृथ्वी का एक छत्र राजा हो कर भविष्य में अन्य श्रेष्ठ राजहंसा अर्थात् राजाओं के महत्त्व की असहनशीलता का परिचय दिया। स पीडयन्नायसपञ्जरस्थान् क्रीडापरः केसरिणां किशोरान् । समाददे भाविरिपुद्विपेन्द्र-युद्धोपयोगीव तदीय शौर्यम् ॥१५॥ अन्वयः क्रीडापरः सः आयसपञ्जरस्थान् केसरिणां किशोरान् पीडयन् भाविरि- पुद्विपेन्द्रयुद्धोपयोगि तदीयौर्य समाददे इव । व्याख्या क्रीडापरो बालक्रीडासक्त स आयसपञ्जरस्थान् लौहनिर्मितपिञ्जरस्थितान् लोहोऽस्त्री शस्त्रक तीक्ष्ण पिण्ड कालायसावसी' इत्यमर । केसरिणा सिंहाना किशोरान् शिशून् पीडयन् बाधमानो भाविषु भविष्यत्सु रिपव एव द्विपेन्द्रास्तेषा शत्रुगजेन्द्राणा युद्धेषु नर्मयेषु 'युद्धमायोजन जन्य प्रधन प्रविदारणम्' इत्यमर' । उपयोगि कार्यसाधकं विजयकारीतिभाव । तदीयं सिंहशिशुसम्बन्धि शौर्य पराक्रमं समाददे इव गृहीतवानिव । सिंहोऽनायासेन स्वशौर्येण गजं हन्ति तदीय शौर्येणायमपि भविष्यत् काले रिपुगजेन्द्रं हनिष्यतीति भाव । रूपकसह- कृतोत्प्रेक्षालङ्कार । भाषा खेलकूद में लगे हुए उस बालक ने लोहे के पिंजरे में के शेर के बच्चों को तंग कर भावी शत्रुरूपी गजेन्द्रों के युद्ध में उपयोगी उनके शौर्य को मानो ले लिया । सिंह ही का शौर्य गजेन्द्रा के मारने में समर्थ होता है । इसलिये इसने शत्रुरूपी गजेन्द्रों को मारने के लिय मानो इनसे शौर्य छीन लिया । प्राप्तोदयः पादनखैश्चकासे स बालचन्द्रः परिवर्द्धमानः । अभ्यर्थमानः सहखेलनाय बालैरपत्यैरिव शीतरश्मेः ॥१६॥ ”