विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)
Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary
महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २७० ) गलच्छिद्रेभ्यो रुधिरं रक्तमाचकाङ्क्ष पातुमैच्छत्। प्रजानां महत्कष्टप्रदोभूत्या तासां गलरक्तमपि पातुमैच्छदिति भावः। काव्यलिङ्गमलङ्कारः। भाषा पिशाची के सदृश राजलक्ष्मी का मुख चुम्बन करने से पिशाची के मुख में लगे हुए रक्त के स्वाद का स्वयं अनुभव कर वह राजा प्रजाओ के गले घोंट कर उनका खून पीने की इच्छा करने लगा। अर्थात् कर आदि लगा कर प्रजाओं को अत्यधिक कष्ट देने लगा। उद्धूतचामरोद्दाम—समीरासङ्गिनेव सः। रजसा पूर्यमाणोऽभून्मार्गं द्रष्टुमनीश्वरः ॥१०६॥ अन्वयः उद्धूतचामरोद्दामसमीरासङ्गिना रजसा इव पूर्यमाणः सः मार्गं द्रष्टुम् अनीश्वरः अभूत्। व्याख्या उद्धूतं वेगेन चालितञ्चामरं प्रकीर्णकं 'चामरं तु प्रकीर्णकम्' इत्यमरः। तस्योद्दाम उत्कटः समीरः पवनस्तस्याऽसङ्गः सम्बन्धोऽस्त्यस्येति तत्तेन वेगसंचा- लितप्रकीर्णकजनितोत्कटपवनसम्बन्धेनेव तत्सम्बन्धादायतेनेव रजसा धूल्या रजो- गुणेन वा पूर्यमाणो पूरितनेत्रोऽत्यन्तं संपुष्टो वा स सोमदेवो मार्गं पन्थानं विवेकयुक्तकार्यं वा द्रष्टुमवलोकयितुं विचारयितुं वाऽनीश्वरोऽभूदसमर्थ इत्येत्यर्थः। अभूत् बभूव। भाषा जोर से डुलाए जाने वाले चंवरो से जोर से बहने वाले वायु के सम्बन्ध से उड़ी हुई धूर (आँखो में पड़ जाने से) पक्ष में चंवर डुलाये जाने के राजकीय ऐश्वर्य के सम्बन्ध से उत्पन्न रजोगुण के कारण से वह राजा सन्मार्ग का अवलोकन करने में असमर्थ हो गया। तेजोनिधीनां रत्नानां संभारं धारयन्नपि। बभूव दैवोपहतस्तमःस्तोमैस्तिरोहितः ॥१०७॥