भारतकोश
विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)

विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)

Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary

महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished493 पृष्ठ

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पृष्ठ 379

( ३७२ ) में आने योग्य कमल वाले बनादिया अर्थात् लक्ष्मी के निवास स्थान कमलो को नष्ट कर दिया जिससे उनके दातो में ही लक्ष्मी वास करे। श्रवणमधुरविस्फुरद्ध्वनीनां व्यधुरुपकारधियेव षट्पदानाम्। मदमलिलमुदारसौरभं ये विटपिविधूननपातिभिः प्रसूनैः ॥४३॥ अन्वयः ये श्रवणमधुरविस्फुरद्ध्वनीनां षट्पदानाम् उपकारधिया इव विटपि- विधूननपातिभिः प्रसूनैः मदसलिलम् उदारसौरभं व्यधुः। व्याख्या ये सोमदेवगजा श्रवणयोः कर्णयोर्मधुरं सुश्राव्यः कोमल इत्यर्थं । विस्फुर- द्विलसद् ध्वनि शब्दो येषा ते तेषा श्रवणमधुरविलसच्छब्दाना षट्पदाना भ्रमराणा ‘षट्पदभ्रमरालय’ इत्यमर । उपकारधिया हितसम्पादनबुद्धयेव विटपिना वृक्षाणा विधूननेनाऽन्दोलनेन पातिभिरथ पतनशीलै प्रसूनै पुष्पैर्मद- सलिल मदजलमुदारोऽधिक सौरभ सुगन्धो यस्मिंस्तत्तथप्पू रचक्रु । कर्णमधुर- शब्देनोपकृता गजा स्वमद पुष्परसेनाधिकं सुरबासु विधाय भ्रमरान् प्रत्युप- कुर्वन्ति स्मेति कविरुत्प्रेक्षते । गज-भ्रमरयो परस्परमादानप्रदानाभ्यां परिवृत्तिर्नामालङ्कार । भाषा इन सोमदेव के हाथियों ने कान में आनन्द देने वाली गूंजार करने वाले भौंरों पर मानो उपकार करने की बुद्धि से वृक्षों को झकझोरने से गिरे हुए फूलों से अपने मद जल को अधिक सुगन्धित बना दिया। अर्थात् भ्रमरों के शब्द द्वारा आनन्द देने से उपकृत होकर उनके लिये अपने मद जल को फूलों से अधिक सुगन्धित बनाकर उनका प्रत्युपकार किया। निजतनूभरगौरवाद्गलन्तीं क्षितिमिर ये दधति स्म शैलतुङ्गाः। मदमुकुलितलोचनाश्चलन्तः किमपि करैः सविलासमुन्नमद्भिः ॥४४॥ अन्वयः शैलतुङ्गाः मदमुकुलितलोचनाः सविलासं चलन्तः ये उन्नमद्भिः करैः निजतनूभरगौरवात् गलन्ती क्षितिं किमपि दधति स्म इव ।