भारतकोश
विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)

विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)

Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary

महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished493 पृष्ठ

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( ३८९ ) भाषा उत्कृष्ट प्रभाव वाले, मृदङ्ग के ऐसे वीरों के गम्भीर शब्दो को प्रकट करने वाले विक्रमाङ्कदेव ने मन्दराचल के समान मदोन्मत्त हाथी पर सवार होकर वेग से शत्रु सेना रूपी समुद्र को मथ डाला। अर्थात् शत्रु की सेना को नष्ट कर दिया। अहमहमिकया प्रधाविताभ्यां मिलितममुष्य बलं तयोर्बलाभ्याम्। सलिलमभिमुखं सहाम्बुराशेस्तदनु महानदयोरिवोदकाभ्याम् ॥६६॥ अन्वयः तदनु अमुष्य बलम् अहमहमिकया अभिमुखं प्रधाविताभ्यां तयोः बलाभ्यां सह अम्बुराशेः सलिलम् अभिमुखं प्रधाविताभ्यां महानद्योः उदकाभ्यां सह इव मिलितम्। व्याख्या तदनु शत्रुसेनासम्मर्दनानन्तरममुष्याऽस्य विक्रमाङ्कदेवस्य बलं सैन्यमहमह- मिकया परस्पराहुङ्कारेण 'अहमहमिका तु सा स्यात्परस्परं यो भवत्यहङ्कारः' इत्यमरः। अभिमुखं सम्मुखं प्रधाविताभ्यां द्रततरमाक्रममाणाभ्यां तयोस्सोम- देवराजिगयोः बलाभ्यां सेनाभ्यां सहाऽम्बूनां जलानां राशिः समुद्रस्तस्य समुद्रस्य सलिलं जलमभिमुखं प्रधाविताभ्यां वेगेन सम्मुखं प्रवहद्भ्यां महानद्योर्विशालन- दयोरुदकाभ्यां जलाभ्यां सहेवं मिलितं सङ्गतम्। अत्र पूर्णोपमालङ्कारः। भाषा शत्रु की सेना को कुचलने के बाद, इस विक्रमाङ्कदेव की सेना, परस्पर अहङ्कार से सामने दौड पडी हुई सोमदेव और राजिग की सेनाओं के साथ, समुद्र का जल, सामने से बह कर आते हुए दो विशाल नदो के जलो के समान, मिल गई अर्थात् जिस प्रकार समुद्र मे दो तरफ से आने वाले दो महानद मिल जाते हैं उसी प्रकार दोनों ओर से आने वाली दो सेनाएं विक्रमाङ्कदेव की सेना से बुझ गईं। मुखमसितपताकया पतन्त्या ध्वजगरुडः परिचुम्बितं दधानः। वदनपरिगृहीतपन्नगस्य व्यतनुत सत्यगरुत्मतः प्रतिष्ठाम् ॥७०॥