भारतकोश
विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)

विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)

Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary

महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished493 पृष्ठ

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( ५ ) श्लोकाः सकलमपि विदन्ति हन्त शून्यं क्षितिपतयः प्रतिहारवारणामिः । क्षणमपि परलोकचिन्तनाय प्रकृतिजडा यदमी न संरभन्ते ॥३२॥ गुणिनमगुणिनं वितर्कयन्ती स्वजनममित्रमनाप्तमाप्तवर्गम् । वितरति मतिविप्लवं नृपाणामियमुपसर्पणमात्रकेण लक्ष्मीः ॥३६॥ मलिनधियां धिगनाऽर्जवं चरित्रम् ॥६१॥ इह हि विहितभूरिदुष्कृतानां विगलति पुण्यचयः पुरातनोऽपि ॥६४॥ यशसि रतिर्महतां न देहपिण्डे ॥७७॥ विमलविजयलालसाः खलानामवसरमल्पमपि प्रतिक्षिपन्ति ॥७८॥ त्रिभुवनमहनीयबाहुवीर्यद्रविणविभूतिमतां किमस्त्यसाध्यम् ॥६१॥ दासी यद्भवनेषु विक्रमधनक्रीता ननु श्रीरियम् तेषामाश्रितपोषखाय गहनं कि नाम पृथ्वोभुजाम् ॥६६॥ सप्तमसर्गे— गुणो हि काले गुणिनां गुणाय ॥३२॥ —श्रीरस्तु—

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