विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)
Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary
महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६० ) मन्तरायो विघ्नोऽभूत् । 'विघ्नोन्तराय प्रत्यूह' इत्यमर । हारसूत्रे यज्ञो- पवीतस्य भ्रान्तिप्रतिपादनाद् भ्रान्तिमानलङ्कार । भाषा प्रहार करने वाले उस सत्याश्रय राजा को युद्ध की धिंगाधिंगी में मोती के हार में से मोतियों के टूटकर गिर पड़ने से केवल डोरा मात्र अवशेष धारण करने वाले मदान्ध शत्रुओं के शरीर पर वार करने में, यह डोरा ब्राह्मण का यज्ञोपवीत तो नहीं है इस भ्रम से क्षणमात्र के लिए रुकावट हो जाया करती थी । अर्थात् यह ब्राह्मण तो नहीं है ऐसा भ्रम हो जाता था । अथाष्टभिः श्लोकैर्जयसिंहदेवं वर्णयति कविः— प्राप्तस्ततः श्रीजयसिंहदेवश्चालुक्यसिंहासनमण्डनत्वम् । यस्य व्यराजन्त गजाहवेषु मुक्ताफलानीव करे यशांसि ॥७६॥ अन्वयः ततः यस्य गजाहवेषु यशांसि करे मुक्ताफलानि इव व्यराजन्त, (सः) श्री जयसिंहदेवः चालुक्यसिंहासनमण्डनत्व प्राप्तः । व्याख्या तत सत्याश्रयानन्तर यस्य राज्ञो गजाना हस्तिनामाहवा सङ्ग्रामास्तेषु 'अभ्यामदसमाघात सङ्ग्रामाभ्यागमहवा' इत्यमर । यशांसि कीर्तय करे हस्ते मुक्ताफलानीव गजमौक्तिकानीव व्यराजन्त विरेजु सुशोभितानिजातानीत्यर्थ । स श्रीजयसिंहदेवस्तन्नामा राजा चालुक्याना चालुक्यवंशीयाना राज्ञा सिंहासन तस्य मण्डनत्व शोभाविधायकत्व प्राप्त । तत्सिंहासनस्यालङ्कारभूतो जात इत्यर्थ । शुक्लयणसादृश्याद्यशस्सु मुक्ताफलत्वस्योत्प्रेक्षणादुत्प्रेक्षा । भाषा राजा सत्याश्रय के अनन्तर श्री जयसिंह देव ने चालुक्य वंशीय राजाओं की राजगद्दी को सुशोभित किया जिसके, हाथी की सेना के युद्ध में प्राप्त यश मानो हाथ में पहिने हुए गजमौक्तिक के समान शोभित होते थे ।