विक्रमोर्वशीयम् (महाकवि कालिदास - संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

विक्रमोर्वशीयम् (महाकवि कालिदास - संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Vikramorvashiyam of Kalidasa with Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / पं. विश्वनाथ शास्त्री द्वारा
DevanagariSanskritpublished168 पृष्ठ
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चतुर्थोऽङ्कः। १११ (ततः प्रविशत्यासने मलयवती) पुप्फपरिच्चाएण समप्पिदो देवरणस्साअब्भो णट्ठअंहे पडहं समप्पिअं जगसिदिणाअब्भो। दसहत्थकङ्कणकुसुमआभरण वसिमअराउलवणकमलव आवरण। पत्तम्मि दुट्ठणडिमहत्यिरिणण्णातु ओधत्तु दगदिस रन्धयिसु जवादहमाउ ॥ ५४ ॥ १ पूर्वदिवसनष्टवस्त्रा नैलकट्टु प्रेयान्कश्चित्सूर्य तेज पिरिभ्यः। दशहस्तकङ्कणकुसुमशामरणः वशिमवराकु कुसुमसमूहावरण। पत्रे नष्टे दुष्ट महस्तहस्त्याणे ओव्याते दश दिशः परिक्षिप्तु जवादशहस्ता ॥ ... ... हरि ... प्रियतम ... नापि प्रभुथ ... ... ... ... नर तादृश ... ... ... ... पद्मरागकान्तः ... ... ... ...