विक्रमोर्वशीयम् (महाकवि कालिदास - संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

विक्रमोर्वशीयम् (महाकवि कालिदास - संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Vikramorvashiyam of Kalidasa with Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / पं. विश्वनाथ शास्त्री द्वारा
DevanagariSanskritpublished168 पृष्ठ
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१९४ विश्रामचौथी ॰ सम्भो ॰ गिरिसुता मूल नव केवल कल कल्प री ॥ १० ॥ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ मन रे समझि विचारि सुत बन्धु परिवार जगत्मा । अंत न कोइ संगै तेरो ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॥ ११ ॥ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ भव की बात, ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ । ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰
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