विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ९७ ५—'दण्डकारन्य कृतपुन्य'—दण्डकारण्यको शाप था। अतः इस वनमें कोई नहीं जाता था। भगवान् रामचन्द्रने इसे पवित्र कर दिया। ६—'कारण'—जिससे कोई वस्तु उत्पन्न होती है, उसे उस वस्तुका कारण कहते हैं। सृष्टिकी उत्पत्ति ईश्वरसे हुई, अतः परमात्मा कारण-स्वरूप हैं और सृष्टि कार्यरूप। जैसे घटका कारण मिट्टी है और मिट्टीका कार्य घट है। ( ५१ ) देव— जानकीनाथ, रघुनाथ, रागादि-तम- तरनि तारुण्यतनु तेजधामं। सच्चिदानंद, आनंदकंदाकरं, विश्व-विश्राम, रामाभिरामं ॥ १ ॥ नीलनव-वारिधर-सुभग-सुभकांति, कटि पीत कौसेयवर वसनधारी। रत्न-हाटक-जटित-मुकुट-मंडित-मौलि, भानु-सत-सहस उद्योतकारी ॥ २ ॥ स्रवन कुण्डल, भाल तिलक, भ्रुरुचिर अति, अरुन अंभोज लोचन बिसालं। बक्र अवलोक त्रैलोक सोकापहं, मार-रिपु हृदय-मानस-मरालं ॥ ३ ॥ नासिका चारु, सुकपोल, द्विज बज्र दुति, अधर बिंबोपमा, मधुर हासं। कंठ दर, चिबुक वर, वचन गम्भीर तर, सत्य संकल्प, सुरत्रास-नासं ॥ ४ ॥ सुमन सुविचित्र नव तुलसिकादल-युतं मृदुल वनमाल उर भ्राजमानं। भ्रमत आमोदवस मत्त मधुकर-निकर, मधुरतर मुखर कुर्वंति गानं ॥ ५ ॥ ७