विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९६ विनय-पत्रिका स्थान बना दिया, आप मृगरूपी मारीचकी माया हरनेवाले, बलवान् बालिरूपी मतवाले हाथीके लिए सिंहरूप और सुहृद सुग्रीवके दुःखोंको दूर करनेवाले हैं ॥६॥ आप विकट योद्धाओंमें श्रेष्ठवीर रीछ और बन्दरोंको साथ लेकर पर्वताकार शत्रुओंको संग्राममें भयभीत करनेवाले, समुद्रको बाँधनेवाले, देवताओंके समूहको मुक्त करनेवाले, तथा दस सिर और बीस विशाल भुजाओंवाले रावणको उसके कुल-सहित नष्ट करनेवाले हैं ॥७॥ आप देवताओंके दुष्ट शत्रु-समूहका नाश करके पृथिवीका भार उतारनेके लिए अवतार लेनेवाले और अनुपम कारणस्वरूप हैं। आप निर्मल, दोषरहित, अद्वैत, त्रिगुणोंसे रहित, सगुण तथा राजाके रूपमें साक्षात् ब्रह्म हैं। मैं आपका स्मरण करता हूँ ॥८॥ शेष, वेद, सरस्वती, शिवजी, नारद और सनकादि आपका गुणानुवाद गाते हैं, पर आपके चरित्रका अन्त नहीं होता। वही 'राम' जो कि शिवजीके प्रिय और अयोध्याके राजा हैं— तुलसीदासको भव-सागरसे उबारनेके लिए सर्वदा नौका-रूप हैं ॥९॥ विशेष १—'गुनगूढ़'—रामजीका गुन कितना गूढ़ है इसे शिवजीने जगज्जननी पार्वतीजीसे इस प्रकार कहा है— उमा रामगुन गूढ़, पण्डित मुनि पावहिं विरति । पावहिं मोह विमूढ़, जे हरि विमुख न धर्मरति ॥ —रामचरितमानस । २—'पाथोजनाभं'—सृष्टिकी उत्पत्तिके प्रकरणमें ऐसा उल्लेख है कि समुद्रमें शेषशायी भगवान् विष्णुकी नाभिसे कमल उत्पन्न हुआ और उस कमलके ऊपर ब्रह्माजी पैदा होकर सृष्टिकी रचना करनेमें तत्पर हुए। इसीसे भगवान् विष्णु पाथोजनाभ कहे जाते हैं। ३—'दुर्ग'—वास्तवमें का अर्थ अर्थ है "जहाँ दुःखसे पहुँचा जा सके।" ४—'भार्गव'—परशुरामजी भृगुवंशके थे, इससे उन्हें भार्गव कहा जाता है।