भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 106, कुल 475 में से

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पृष्ठ 106

विनय-पत्रिका ९५ सेष-श्रुति-सारदा-संभु-नारद-सनक गनत गुन अंत नहिं तव चरित्रं । सोइ राम कामारि-प्रिय अवधपति सर्वदा दास तुलसी - त्रास - निधि - वहित्रं ॥९॥ शब्दार्थ—बैनतेय = गरुड़ । तून = तरकस । विसिख = बाण । पाथोजनाभं = जिसकी नाभिसे कमल उत्पन्न हुआ हो अर्थात् विष्णु । अपवर्ग = मोक्ष । पादप = वृक्ष । कुठार = टाँगा, कुल्हाड़ा । सदसि = सभा । भार्गवागर्व = (भार्गव+आगर्व) परशुरामका गर्व । श्री = लक्ष्मी, सम्पत्ति । मनुजमनुसृत्य = (मनुजं+अनुसृत्य) मनुष्योंको अनुकरण करके । अज = अजन्मा । कुरंग = मृग । सुहृद = मित्र । उद्धट = श्रेष्ठ वीर । संकास = समान । अनवद्य = दोषरहित । वहित्रं = नौका । भावार्थ—हे देव ! आप सूर्य-कुलरूपी कमलके लिए सूर्य, करोड़ों कामदेव- के समान शोभावाले, कलिकालरूपी सर्पके लिए गरुड़, बलवान् हाथोंमें प्रचंड धनुष धारण करनेवाले, तरकसमें सुन्दर बाण धरे और अनुपम बलशाली हैं ॥१॥ आप लाल कमलके समान नेत्रवाले, सौन्दर्यके निधान, मेघकी सुन्दर आभाके सदृश कान्तिमय श्यामल शरीरवाले, तपे हुए सुवर्णके समान पीताम्बरधारी, शस्त्र-विद्यामें कुशल, सिद्धों और देवताओंके पूज्य तथा पाथोजनाभ हैं अर्थात् आपकी नाभिसे कमल उत्पन्न हुआ है ॥२॥ आप सम्पूर्ण सुन्दरताके घर हैं, विश्व ब्रह्माण्ड आपका शरीर है, आप अत्यन्त चतुर, गूढ़ गुणवाले, अपार- महिम, निर्भीक, दुस्तर, दुर्गम, स्वर्गापवर्गके स्वामी, तथा संसार-वृक्षको काटनेके लिए कुठाररूप हैं ॥ ३ ॥ आपने गौतमकी स्त्रीको शापमुक्त किया है, आप ब्राह्मणोंका हित करनेवाले (ब्रह्मण्य), विश्वामित्रके यज्ञकी रक्षा करनेमें सुदक्ष, स्वजनोंका पक्ष लेनेवाले, राजा जनककी सभामें शिव-धन्वाको खंड-खंड करने- वाले तथा उग्ररूप परशुरामजीकी महान् गर्व-गरिमाका हरण करनेवाले हैं ॥४॥ आपने गुरुजनों (पिता-माता) के वचनोंका गौरव रखनेके लिए ऐसे राज्य और धनको त्याग दिया जिसे देवता लोग भी कठिनाईसे भी नहीं त्याग सकते हैं; आप अजन्मा होनेपर भी अपने भाई लक्ष्मण और जानकीजीको साथ लेकर मनुष्योंकी तरह लीला करते हुए दुष्टोंका वध करनेमें तत्पर तथा तीनों लोकोंकी रक्षा करनेवाले हैं ॥५॥ आपने अपने पवित्र चरणोंसे दंडक वनको पुण्यमय

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