भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 105, कुल 475 में से

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पृष्ठ 105

अरुन राजीव दल-नयन, सुषमा-अयन, स्याम तन-कांति वर वारिदाभं। तप्त कांचन-वस्त्र, सस्त्र-विद्या-निपुन, सिद्ध-सुर-सेव्य, पाथोजनाभं ॥२॥ अखिल लावन्य-गृह, विश्व-विग्रह, परम प्रौढ़, गुनगूढ़, महिमा उदारं। दुर्धर्ष, दुस्तर, दुर्ग, स्वर्ग-अपवर्ग-पति भग्न संसार-पादप-कुठारं ॥३॥ सापदस मुनिवधू-मुक्तकृत, विप्रहित, जग्य-रच्छन-दच्छ पच्छकर्ता। जनक-नृप-सदसि सिवचाप-भंजन, उग्र भार्गवागर्व-गरिमापहर्ता ॥४॥ गुरु-गिरा-गौरवामर-सुदुस्त्यज राज्य, त्यक्त श्री सहित सौमित्रि-भ्राता। संग जनकात्मजा, मनुजमनुसृत्य अज, दुष्ट-बध-निरत, त्रैलोक्यत्राता ॥५॥ दंडाकारन्य कृतपुन्य पावन चरन, हरन मारीच-मायाकुरंगं। बालि बलमत्त गजराज इव केसरी, सुहृद-सुग्रीव-दुख-रासि-भंगं ॥६॥ ऋच्छ, मर्कट विकट सुभट उद्भट समर, सैल-संकास रिपु त्रासकारी। बद्धपाथोधि सुर-निकर-मोचन, सकुल दलन दससीस-भुजवीस मारी ॥७॥ दुष्ट विबुधारि-संघात, अपहरन महि- भार, अवतार कारन अनूपं। अमल, अनवद्य, अद्वैत, निर्गुन, सगुन, ब्रह्म सुमिरामि नरभूप-रूपं ॥८॥

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