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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 104

४—'दच्छमख'—दक्ष प्रजापतिकी एक कन्याका नाम सती था। उनका विवाह शिवजीके साथ हुआ था। एक बार ब्रह्माके यहाँ दक्ष पहुँचा। सब देवताओँने उठकर उसकी अभ्यर्थना की, पर शिवजी नहीं उठे। इससे दक्ष बहुत नाराज हुआ। इसका बदला लेनेके लिए उसने खूब धूमधामसे यज्ञ किया, और उसमें सब देवताओँको आमन्त्रित किया, पर शिवको नहीं पूछा। यज्ञका हाल सुनकर सती बिना बुलाये ही अपने पिताके घर चली गयीं। वहाँ उन्हें शिवजीका भाग दिखलाई नहीं पड़ा। इससे वह क्रुद्ध होकर अपने पिता- को कटु वाक्य कहने लगीं और योगाग्निमें जलकर भस्म हो गयीं। यह समाचार पाकर शिवजीने वीरभद्रको भेजा और उसने वहाँ जाकर शिवजीकी आज्ञासे दक्ष प्रजापतिका यज्ञ भंग कर दिया। पीछे शिवजीने प्रसन्न होकर यज्ञका पुनरुद्धार किया। यह कथा शिवपुराणमें विस्तारपूर्वक है। ५—विष्णु और शिवमें अभेदसम्बन्ध है। लिखा है:— सदैव देवो भगवान् महादेवे न संशयः। मन्यन्ते ये जगद् योनिं विभिन्नं विष्णुमीश्वरात्। —इति कौर्मे, १३ अध्यायः ६—'संभु सिव रुद्र संकर'—पर्यायवाची शब्द हैं, पर सबका भिन्न-भिन्न आशय है। ७—'भयंकर भीम घोर'—का आशय भी अलग-अलग है। यथा 'भयंकर' का अर्थ 'भयजनक', 'भीम' का अर्थ 'भयके हेतु', 'घोर' का अर्थ 'विष' अर्थात् 'हलाहल पान करके आश्चर्यजनक भीषण काम करनेवाले' इत्यादि।

( ५० )

देव— भानुकुल-कमल-रवि, कोटि कंदर्प छवि, काल-कलि-व्यालमिव वैनतेयं। प्रबल भुजदंड प्रचंड कोदंड-धर, तूनवर विसिख बलमप्रमेयं ॥ १ ॥