विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 103, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ें९२ विनय-पत्रिका के लिए कामधेनुके समान हैं, आप हरि हैं और दुर्घट, विकट तथा महान् विपत्तियोंको हरनेवाले हैं । हे देव आप सुखदाता, आनन्ददाता, इच्छित वरदाता, विरक्त, तमाम विकारों और दोषोंसे रहित एवं आनन्द-वन काशीकी गलियोंमें विहार करने- वाले हैं ॥८॥ हे देव ! इस मनोहर हरिशंकरीके नाम-मंत्रोंकी पंक्तियाँ राग-द्वेषादि द्वन्द्वोंसे उत्पन्न दुःखको हरनेवाली तथा आनन्दकी खानि हैं । तुलसीदास शुद्ध वाणीसे कहता है कि ये विष्णु तथा शिवलोकमें जानेके लिए सदैव सीढ़ीके समान हैं ॥९॥ विशेष १—'वामन'—विष्णु भगवान्ने राजा बलिसे तीन पैर पृथिवी लेनेके लिए वामन (बौना) रूप धारण किया था । २—'कालिय' नामक एक भयंकर सर्प था जो कि यमुनामें रहता था । उसके विषकी ज्वालासे वहाँका पानी हमेशा खौला करता था । भगवान् श्रीकृष्णने उसे नाथकर अपने वशमें कर लिया, पीछे वह यमुनाको छोड़कर समुद्रमें चला गया । यह कथा श्रीमद्भागवतमें है । ३—'अन्धक'—नामक एक दैत्य था । वह बहुत ही उपद्रवी और बलवान् था । वह हिरण्याक्षका पुत्र था । उसने ब्रह्मासे यह वर प्राप्त किया था कि ज्ञान प्राप्त हुए बिना मेरी मृत्यु कदापि न हो । यह वर मिलनेके बाद उसने तीनों लोकोंको जीत लिया । देवता लोग उसके भयसे मन्दराचल पहाड़पर चले गये । वह दुष्ट वहाँ भी पहुँचकर उन्हें दुःख देने लगा । देवताओंने आर्त स्वरमें शिवजीको पुकारा । शिवजीने आकर उसे मार डाला । यह कथा शिव- पुराणमें है । ३—'सिंधु-सुत'—या जलन्धर बड़ा प्रतापी राजा था । इसने देवलोकको जीत लिया था । शिवजीने इसे मारना चाहा, पर उन्हें सफलता नहीं मिली, क्योंकि जलन्धरकी स्त्री वृन्दा पतिव्रता थी । जब विष्णुने बलपूर्वक वृन्दाका सतीत्त्व नष्ट किया, तब शिवजीने जलन्धरको परास्त किया । उस समय वृन्दाने विष्णुको शाप दिया कि किसी समय मेरा पति रावणका अवतार लेकर तुम्हारी स्त्रीका हरण करेगा ।