भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 102

विनय-पत्रिका ९१ हे देव ! आप कैलाशगिरिके मालिक, जगत्के स्वामी, ईशान, विज्ञानघन और ज्ञान तथा कल्याणके स्थान हैं ॥२॥ हे देव ! आप वामनरूप, अव्यक्त, पवित्र, जड़-चैतन्यके स्वामी, साक्षात् परमात्मा और प्रकृतिके स्वामी हैं । हे देव ! आप चन्द्रमाको मस्तकपर और त्रिशूलको हाथमें धारण करनेवाले, सृष्टिके संहारकर्त्ता, निष्पाप, अजन्मा, सीमा-रहित, अखंड और नन्दीपर सवार होकर चलनेवाले हैं ॥३॥ हे देव ! आपके श्यामल शरीरकी आभा नीले मेघके समान है, शोभा अनेक कामदेव-सदृश है, आप राम हैं, कमलनेत्र हैं और कृपालु हैं । हे देव ! आपका उज्ज्वल शरीर शंख और कपूरके समान निर्मल है; आपके मस्तकपर जटा-जूट और गंगाजी हैं । आप सफेद फूलोंकी माला पहने हुए हैं ॥४॥ हे देव ! आप कमल-केसरके समान पीताम्बर तथा चक्र, धनुष, शंख और अत्यन्त विशाल गदा धारण किये हैं । हे देव ! आप कामदेवरूपी हाथीके लिए सिंह, तीन नेत्रवाले और संसारका कष्ट दूर करनेवाले हैं । अतः हे हर, मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥५॥ हे देव ! आप कृष्ण हैं अर्थात् अपने रूप-माधुर्यसे सबको आकर्षित करने- वाले हैं, करुणाके स्थान हैं, कालिय नागका नाश करनेवाले हैं तथा कंस आदि बहुत-से दुष्टोंका निर्वंश करनेवाले हैं । हे देव ! आप त्रिपुर दैत्यका घमण्ड तोड़नेवाले, मतवाले हाथीका चमड़ा धारण करनेवाले तथा अन्धकासुररूपी सर्पको निगलनेके लिए गरुड़ हैं ॥६॥ हे देव ! आप ब्रह्म, सबमें व्याप्त, कला-रहित, सबसे परे, हितैषी, साधारण ज्ञान और इन्द्रियोंसे न्यारे तथा मायिक वृत्तियोंको हरनेवाले हैं । हे देव ! आप जलन्धरके गर्वरूपी पर्वतको चूर्ण करनेके लिए वज्ररूपी, पार्वतीके पति, संसारकी उत्पत्तिके स्थान और दक्ष प्रजापतिके सम्पूर्ण यज्ञका विध्वंस करनेवाले हैं ॥७॥ हे देव ! आपको भक्ति बहुत प्रिय है, आप अपने भक्तोंकी इच्छा पूरी करने-