भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 101

९० विनय-पत्रिका ब्रह्म, व्यापक, अकल, सकल-पर, परमहित, ग्यान, गोतीत गुन-वृत्ति-हर्त्ता। सिंधुसुत-गर्व-गिरि-बज्र, गौरीस, भव दच्छ-मख अखिल विध्वंसकत्र्ता ॥७॥ भक्ति प्रिय, भक्तजन-कामधुक धेनु, हरि, हरन दुर्घट विकट विपति भारी। सुखद, नर्मद, वरद, विरज, अनवद्यऽखिल, विपिन-आनंद-वीथिन-विहारी ॥८॥ रुचिर, हरिसंकरी नाम-मंत्रावली द्वन्द्वदुख हरनि, आनंदखानी। विष्णु-सिव-लोक-सोपान-सम सर्वदा वदति दास तुलसी विसद वानी ॥९॥ शब्दार्थ—अविनासी = जिसका कभी नाश न हो। जगदंत = संसारका अन्त करने- वाले। अंतक = काल। ईसान = ईशान कोणके स्वामी अर्थात् शिवजी। अनघ = पापरहित। किंजल्क = कमल-केसर। दर = शंख। कौमोदकी = गदा। कालीय = कालिय दैत्य। उरग = सर्प। वरद = वर देनेवाले। वीथिन = गलियों। विसद = शुद्ध या पवित्र। [ गुसाईंजीने इस पदका नाम 'हरिशंकरी पद' रखा है; क्योंकि उन्होंने इस पदके एक पक्षमें विष्णुकी और दूसरेमें शिवकी एक साथ स्तुति करके हरिहरमें अभेद सिद्ध किया है । ] आरम्भमें जो 'देव' शब्द है, उसे प्रत्येक पक्षका सम्बोधन समझना चाहिये। भावार्थ—हे देव ! आप दैत्यरूपी वनको जलानेवाले, सद्गुण-समूह, इन्द्रियोंके अधीश्वर तथा नन्द-उपनन्द आदिको आनन्द देनेवाले और अविनाशी हैं। हे देव ! आप शम्भु, शिव, रुद्र, शंकर आदि नामोंसे विख्यात हैं। आप बड़े ही भयंकर, महान् तेजस्वी तथा (खलोंके लिए) क्रोधकी राशि हैं ॥१॥ हे देव ! आपका अन्त नहीं है; आप छ प्रकारके ऐश्वर्योंसे युक्त हैं, संसारका अन्त करनेवाले, कालके भयको दूर करनेवाले, लक्ष्मीजीके स्वामी और विश्वब्रह्मांडको आनन्द देनेवाले हैं।