भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 113

१०२ विनय-पत्रिका कालकलिजनित मलमलिन मन सर्वनर मोह-निसि निविड़ जमनांधकारं । विष्णुजस पुत्र कलकी दिवाकर उदित दास तुलसी हरन विपति भारं ॥९॥ शब्दार्थ - गायंति = गाते हैं । वारिचर = मत्स्य । वपुष = शरीर । गुर्वी = श्रेष्ठ । क्रोड़ = शूकर । उर्वी = पृथिवी । कमठ = कच्छप । कंडु = खुजलाहट । इंदिरा = लक्ष्मी । वृंदारका- वृंद = देव-गण । मृगराज = नृसिंह । वटु = ब्रह्मचारी । ससि = शस्य, धान, धान्य । भूमि- भर = पृथिवीभर, समूची पृथ्वी । राकेस = चन्द्रमा । वंसाटवी = वंश-वन । धूमकेतू = अग्नि । कलकी = कल्कि । भावार्थ—हे देव ! हे कोशलपति ! हे जगदीश ! आप संसार के एकमात्र हितकारी हैं और अपने अमित गुणोंकी अपार लीलाका विस्तार करनेवाले हैं । आपके सुन्दर और पवित्र चरित्रको वेद, शेष, शुकदेव, शिव, सनकादि तथा मननशील मुनि गाते हैं ॥१॥ आपने अपने भक्तोंके उद्धारके लिए मत्स्यरूप धारण करके पृथिवीकी नौका बनायी; आपकी महिमा अपार है । आप समस्त यज्ञोंके अंशरूप हैं, और उग्र शरीरवाले शूकर रूपमें हिरण्याक्ष नामक दैत्यराजका मर्दन करके पृथिवीका उद्धार करनेवाले हैं ॥२॥ हे मुरारे ! आप अत्यन्त विक- राल कछुएगा शरीर धारण करके अपनी कठिन पीठपर घूमते हुए मन्दराचल पर्वतसे खुजलाहट का सुख प्राप्त करनेवाले तथा (समुद्रमंथन करके) अमृत, कामधेनु, लक्ष्मी और चन्द्रमाको उत्पन्न करके देवताओंको आनन्दित करनेवाले हैं ॥३॥ आप नृसिंहरूप धारण करके मनुष्य, मुनि, सिद्ध, देवता और नागोंको दुःख देनेवाले तथा ब्राह्मण-धर्मकी मर्यादा हरण करनेवाले महान् शत्रु दुष्ट दैत्य हिरण्यकशिपुको फाड़कर उसके पुत्र भक्त प्रह्लादको आह्लादित करनेवाले हैं ॥४॥ आपने बलिको छलनेके लिए वामन ब्रह्मचारीका कपटरूप धारण करके तीन पैरमें तीनों लोकोंको नाप लिया । नापते समय आपके चरण-नखसे तीनों लोकोंको परम पवित्र करनेवाला जल निकला जोकि गंगाके नामसे प्रसिद्ध हुआ । आपने छलसे बलिका राज्य ले लिया और उसे इन्द्रको देकर देवताओंकी माता अदितिका दुःसह शोक हर लिया॥५॥ आप क्षत्रिय राजारूपी हाथियोंके समूहको विदीर्ण करने- के लिए पुरुष-सिंहरूप तथा ब्राह्मणरूपी धान्यके लिए मेघरूप परशुरामका अवतार