विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका १०३ धारण करनेवाले हैं। आप बीस भुजा और दस शिरवाले रावणको अपने प्रचंड और वेगवान बाणोंसे खंड-खंड करनेके लिए महाराज रामचन्द्रका अवतार धारण करनेवाले हैं; आपको मैं प्रणाम करता हूँ ॥६॥ समूची पृथिवीका भार उतारने तथा भक्तोंकी रक्षाके लिए आप परब्रह्म परमात्मा होकर भी नर-रूप धारण करने- वाले हैं। आप वृष्णि-कुल-कुमुदको विकसित करनेवाले चन्द्रमा-स्वरूप, राधा- रमण, तथा कंसके वंशरूपी वनको जलानेके लिए अग्निरूप हैं ॥७॥ पृथिवी मंडलको प्रबल पाखंडोंसे व्याकुल देखकर आपने यज्ञादि कर्मोंकी निन्दा की; ऐसे शुद्ध बोध-स्वरूप, विज्ञानघन, सकल-गुण-निधान, अजन्मा, कृपालु आपके बौद्धा- वतारकी मैं वन्दना करता हूँ ॥८॥ कलिकाल-जनित पापोंसे सब मनुष्योंके मन मलिन हो रहे हैं; आप इस महानिशाके म्लेच्छरूपी सघनान्धकारका नाश करनेके लिए उदय हुए सूर्यकी भाँति विष्णुयश नामक ब्राह्मणके यहाँ पुत्ररूपसे कल्कि अवतार धारण करनेवाले हैं। आप इस तुलसीदासको विपत्तियोंके भारको दूर कर दीजिये ॥९॥ विशेष १—इस पदमें दशावतारकी चर्चा है। भगवान्के मुख्य दसों अवतार ये हैं:—(१) मत्स्य, (२) वाराह, (३) कूर्म, (४) नृसिंह, (५) वामन, (६) परशुराम, (७) राम, (८) कृष्ण, (९) बुद्ध, (१०) कल्कि। इनमें प्रथम चार अवतार सत्ययुगमें, उसके बादके तीन अवतार (वामन, परशुराम और राम) त्रेतामें, उसके बादके दो अवतार (कृष्ण, बुद्ध) द्वापरके अन्तमें हुए हैं और अन्तिम कल्कि अवतार कलियुगके अन्तमें होगा। यह दशावतारी पद महाकवि जयदेवकृत ‘गीतगोविन्द’ नामक काव्य-ग्रंथकी एक अष्टपदीसे मिलता-जुलता है। उस अष्टपदीका प्रारम्भ इस प्रकार है:— "प्रलयपयोधि जले धृतवानसि वेदम्। विहित वहित्र चरित्रमखेदम् ॥ केशवधृत मीन शरीर, जय जगदीश हरे ॥१॥ क्षितिरति विपुलतरे तवतिष्ठति पृष्ठे । धरणि धरण किणचक्र गरिष्ठे ॥ केशवधृत कच्छप रूप, जय जगदीश हरे ॥२॥