विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०४ विनय-पत्रिका वसति दशन-शिखरे धरणी तव लग्ना । शशिनि कलंक कलेव निमग्ना ॥ केशवधृत शूकर रूप, जय जगदीश हरे ॥३॥ तव कर कमलवरे नखमद्भुत श्रृंगम् । दलित हिरण्यकशिपु-तनु भृङ्गम् ॥ केशवधृत नरहरि रूप, जय जगदीश हरे ॥४॥ छलयसि विक्रमणे कलिमद्भुत वामन । पदनख नीर जनित-जन पावन ॥ केशवधृत वामन रूप, जय जगदीश हरे ॥५॥ क्षत्रिय रुधिर मये जगदपगत पापम् । स्नपयसि पयसि शमित भवतापम् ॥ केशवधृत भृगुपति रूप, जय जगदीश हरे ॥६॥ वितरसि दिक्शुरणे दिग्पति कमनीयम् । दशमुख मौलिबलिं रमणीयम् ॥ केशवधृत राम शरीर, जय जगदीश हरे ॥७॥ वहसि वपुषि विशदे वसनं जलदाभम् । हलहति भीति मिलित यमुनाभम्॥ केशवधृत हलधर रूप, जय जगदीश हरे ॥८॥ निन्दसि यज्ञविधे रहहश्रुति जातम् । सदय हृदय दर्शित पशु घातम् ॥ केशवधृत बुद्ध शरीर, जय जगदीश हरे ॥९॥ म्लेच्छ निवह निधने कलयसि करवालम् । धूमकेतुमिव किमपि करालम् ॥ केशवधृत कल्कि शरीर, जय जगदीश हरे ॥१०॥ २—'जगदेकहित'—परमात्माका अवतार केवल संसारका कल्याण करनेके लिए ही हुआ करता है। गीतामें भगवान्ने स्वयं कहा है:— यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥ × . × परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ ३—'अतुल मृगराज'—का अर्थ है, 'तुलना-रहित सिंह' अर्थात् 'नृसिंह' । ४—'प्रबल पाखंड...कर्मजाल'—बौद्धावतारके पहले यज्ञोंमें पशुबलि इत्यादि की जाती थी, इसीसे भगवान् बुद्धने उसे पाखंड समझकर उसका खंडन किया था । इस रचनासे स्पष्ट ज्ञात होता है कि गोस्वामीजो धर्मके नाम- पर पशुबलि आदिको केवल ढोंग समझते थे ।