विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका १०७ कामदेवकी सुन्दरताके अभिमानको चूर करनेवाले, सौन्दर्यकी सीमा और अत्यन्त रमणीय हैं। आप दुष्प्राप्य, बड़ी कठिनाईसे दर्शन देनेवाले, दुस्तर्क्य, दुष्पार, जन्म-मरणरूप संसारके हरनेवाले तथा कोमल भाव द्वारा सुलभतासे प्राप्त होने- वाले हैं ॥४॥ आप सत्यको उत्पन्न करनेवाले, सदैव सत्यमें रत रहनेवाले, सत्यव्रती, पुष्ट (दिव्य सामर्थ्यवान्), सन्तुष्ट और कष्टोंको हरनेवाले हैं। आप धर्मरूपी कवच धारण करनेवाले, ब्रह्मस्वरूप, कर्मज्ञानमें अद्वितीय, ब्राह्मणोंके पूज्य, ब्राह्मणोंकी रक्षा करनेवाले, भक्तोंके प्रिय तथा मुर नामक दानवके शत्रु हैं ॥५॥ आप नित्य, मोहममता-रहित, नित्यमुक्त, मान-रहित, विष्णु, ज्ञानघन, सच्चिदानन्द और सबके मूल कारण हैं। आप सबके रक्षक, सबको भक्षण करनेवाले (यमराज) के स्वामी, कूटस्थ, गूढ़ तेजवाले तथा भक्तोंपर कृपा करनेवाले हैं ॥६॥ आप ही सिद्ध, साधक और साध्य हैं, वाच्य और वाचक हैं, आप ही मंत्र, जापक और जाप्य हैं तथा आप ही सृष्टि और स्रष्टा हैं। आप परम कारण, पद्मनाभ, मेघकी आभाके समान शरीरवाले, सगुण और निर्गुण हैं। सब दृश्य भी आप ही हैं और उसके द्रष्टा भी आप ही हैं ॥७॥ आप आकाशकी तरह व्यापक, रजोगुण आदिसे रहित, साक्षात् ब्रह्म, वर देनेवालोंके स्वामी, बैकुंठ एवं निर्मल वामन ब्रह्मचारी हैं। आप सिद्ध और देव-समूह द्वारा सदैव वन्दित तथा पाखण्डका खंडन करके उसे निर्मूल करनेवाले (बुद्ध अवतार) हैं ॥८॥ आप पूर्ण आनन्दके समूह, मोह और अज्ञान-जनित तीनों गुणोंके या त्रिदोषके नाशक हैं। आप वचन, मन और कर्मसे शरणमें आये हुए इस तुलसीदासके भव-भयरूपी समुद्रको सोखनेके लिए अगस्त्य ऋषिके समान हैं ॥९॥ विशेष १—'कर्मबोधैक'—कर्मकी गति ऐसी गहन है कि उसका पूर्ण ज्ञान केवल परमात्माको ही है। कर्मकी गहनताके विषयमें गीतामें भगवान्ने कहा है:— कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः । अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥