विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 119, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ें१०८ विनय-पत्रिका अथवा 'ब्रह्मकर्मबोधैक' का अर्थ 'वेदविहित कर्मके ज्ञानमें अद्वितीय' भी किया जा सकता है। क्योंकि 'ब्रह्म' शब्द कई जगह 'वेद' के लिए व्यवहृत हुआ है। २—'निर्मान'—ईश्वर मानरहित हैं। यदि ऐसा न होता तो वह मत्स्य, शूकरादिका रूप न धारण करते। ३—'गूढार्चि'—परमात्माने अवतार लेकर अपने ईश्वरत्वके तेजको छिपा रखा है, इसीसे उन्हें गूढार्चि कहा गया है। ४—"सिद्ध साधक...द्रष्टा"—यहाँ गोस्वामीजीने अद्वैत वेदान्तानुसार ब्रह्मका निरूपण किया है। इसी प्रकार रामचरितमानसमैं भी ग्रन्थकारने सृष्टि- को ईश्वरके रूपमें देखा है:— सीयराममय सब जग जानी। करौं प्रनाम जोरि जुग पानी ॥ वास्तवमें ब्रह्मके सिवा विश्व-ब्रह्माण्डमें दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं। इसीसे कहा भी है कि— सर्वं खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन । ( ५४ ) देव— विस्व-विख्यात, विस्वेस, विस्वायतन, विस्वमरजाद, व्यालारिगामी। ब्रह्म, वरदेस, वागीस, व्यापक, विमल, विपुल बलवान, निर्वानस्वामी ॥१॥ प्रकृति, महतत्व, शब्दादि गुन, देवता व्योम, मरुदग्नि, अमलांबु, उर्वी। बुद्धि, मन, इन्द्रिय, प्रान, चित्तातमा, काल, परमानु, चिच्छक्ति गुर्वी ॥२॥