भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 120

विनय-पत्रिका १०१ सर्वमेवात्र त्वद्रूप भूपालमनि ! व्यक्तमव्यक्त, गतभेद, विष्णो । भुवन भवदंग, कामारि-वंदित, पद- द्वंद्व मंदाकिनी-जनक, जिष्णो ॥३॥ आदिमध्यांत, भगवंत ! त्वं सर्वगत- मीस, पश्यन्ति ये ब्रह्मवादी । जथा पट-तंतु, घट-मृत्तिका, सर्प स्रग, दारुकरि, कनक-कटकांगदादी ॥४॥ गूढ़, गंभीर, गर्वघ्न, गूढ़ार्थवित्, गुप्त, गोतीत, गुरु, ग्यान-ग्याता । ग्येय, ग्यानप्रिय, प्रचुर गरिमागार, घोर-संसार-पर, पार-दाता ॥५॥ सत्य संकल्प, अतिकल्प, कल्पांतकृत, कल्पनातीत, अहि-तल्पवासी । वनज-लोचन, वनज-नाभ, वनदाभ-वपु, वनचरध्वज-कोटि लावन्यरासी ॥६॥ सुकर, दुष्कर, दुराराध्य, दुर्व्यसनहर, दुर्ग, दुर्धर्ष, दुर्गात्तिहर्त्ता । वेदगर्भार्भकादक्ष-गुन गर्व, अर्वागपर-गर्व-निर्वाप-कर्त्ता ॥७॥ भक्त अनुकूल, भवसूल-निर्मूलकर, तूलअघ - नाम पावक-समानं । तरल तृष्णातमी-तरनि, धरनी धरन, सरन-भयहरन, करुनानिधानं ॥८॥ बहुल बृंदारकावृंद - वंदारु-पद- द्वंद्व, मंदार-मालोर-धारी । पाहि मामीस संताप-संकुल सदा दास तुलसी प्रनत रावनारी ॥९॥