विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 121, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ें११० विनय-पत्रिका शब्दार्थ—व्यालारि = गरुड़ । वागीस = सरस्वतीके ईश, वाणीके अधिष्ठाता । निर्वाण = मुक्ति । उर्वी = पृथिवी । गुर्वी = बहुत बड़ी । जिष्णो = सर्वजित् । त्वं = तुम्हें । पश्यन्ति = देखते हैं । स्रग = माला । कटकांगदादी = (कटक+अंगद+आदि) कड़े, बाजूबन्द आदि गहने । तल्प = शय्या, सेज । वनज = कमल । वनदाम = (वनद+आभ) मेघकी आभा । वपु = शरीर । वनचर-ध्वज = मकरकेतु, कामदेव । सुकर = सुलभ । दुर्गति = कठिन दुःख । वेदगर्भार्भकादभ्र = (वेदगर्भ = ब्रह्मा + अर्भक = बालक + अदभ्र = बहुत) । निर्वाप = नाश । तरल = चंचल । तमी = रात्रि । वंदारु = वन्दनीय । माम् = मुझे । भावार्थ—हे देव ! आप संसार-प्रसिद्ध, जगत्के स्वामी, विश्वके गृह (विराट्रूप), जगत्की मर्यादा, और गरुड़पर चढ़कर चलनेवाले हैं। आप ब्रह्म हैं, वर देनेवाले देवताओंके स्वामी, सरस्वतीके ईश, व्यापक, निर्मल, अत्यन्त बलवान् और मुक्तिके स्वामी हैं ॥१॥ प्र कृति, महत्तत्त्व, शब्दादि, गुण, देवता, आकाश, वायु, अग्नि, निर्मल जल और पृथिवी, बुद्धि, मन, दसो इन्द्रियाँ, पंच- प्राण, चित्त, आत्मा, काल, परमाणु, श्रेष्ठ चित्-शक्ति आदि प्रत्यक्ष और अप्र- त्यक्ष (प्रकृतिसे लेकर चित्-शक्तितक) सब आपके ही रूप हैं ॥२॥ हे राज- राजेश्वर ! हे विष्णो ! आप भेद (सजातीय, विजातीय और स्वगत इन तीनों भेदोंसे) रहित हैं। यह विश्व-ब्रह्माण्ड आपका अंग है। हे सर्वजित् ! आपके युगल-चरण शिवजी द्वारा वन्दित हैं, और ये ही चरण गंगाजीको उत्पन्न करने वाले हैं ॥३॥ हे भगवन् ! आप ही आदि, मध्य और अन्त हैं तथा सर्वगत ईश्वर हैं। जो ब्रह्मवादी हैं वे आपको वैसा ही देखते हैं जैसे वस्त्रमें तन्तु (सूत), घड़ेमें मिट्टी, सर्पमें माला, लकड़ीके बने हुए हाथीमें लकड़ी तथा कड़े, बाजू आदि गहनोंमें सुवर्ण ॥ ४ ॥ आप गूढ़, गम्भीर, गर्व-हन्ता, गूढ़ अर्थके जाननेवाले, गुप्त, इन्द्रियातीत, गुरु, ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय स्वरूप, ज्ञानप्रिय, अगाध गरिमाके घर और घोर संसारसे परे एवं उससे पार कर देनेवाले हैं ॥५॥ आप सत्य- संकल्प और कल्पसे परे हैं। आप महाप्रलय करनेवाले, कल्पनातीत तथा शेष शय्यापर निवास करनेवाले हैं। आप कमल-नेत्र, पद्मनाभ, मेघकी आभाके समान शरीरवाले और कामदेवोंके समान सौन्दर्यकी राशि हैं ॥६॥ आप (भक्तोंके लिए) सुलभ तथा (दुष्टोंके लिए) दुर्लभ हैं। आपकी आराधना बड़ी कठिनतासे होती है। आप बुरे व्यसनोंको नष्ट करनेवाले, दुर्गम (कठिनतासे