विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका १११ मिलनेवाले), दुर्द्धर्ष और कठिन दुःखोंको हरनेवाले हैं। ब्रह्माके पुत्र सनकादिकको अपनी परा और अपरा विद्याका बहुत गर्व था, उस गर्वका खर्व करनेवाले भी आप ही हैं ॥७॥ आप भक्तोंपर प्रसन्न रहनेवाले तथा सांसारिक दुःखोंको जड़से उखाड़ देनेवाले हैं। आपका नाम पापरूपी रूईको भस्म करनेके लिए अग्निके समान है। आप चंचल तृष्णारूपी अन्धकारको दूर करनेके लिए सूर्यरूप हैं, पृथिवीको धारण करनेवाले हैं, शरणागत जनोंका भय दूर करनेवाले तथा करुणा-निधान हैं ॥८॥ देव-समूह आपके दोनों चरणोंकी बहुत वन्दना किया करता है। आप मन्दारकी माला पहने रहते हैं। हे रावणके शत्रु श्रीरामजी ! सदैव सन्तापोंसे परिपूर्ण तुलसीदास आपको प्रणाम करता है। हे प्रभो ! मेरी रक्षा कीजिये ॥९॥ विशेष १—'शब्दादि'—शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये पाँचों पंच ज्ञाने- न्द्रियोंके विषय हैं। २—'गुण'—सत्त्व, रज और तम ये तीन गुण हैं। ३—'व्योम...उर्वी'—आकाश, वायु, तेज (अग्नि), जल और पृथिवी ये पाँच महाभूत हैं। इन्हीं पंचभूतोंसे सृष्टिकी उत्पत्ति हुई है। ४—'इन्द्रिय'—पंच ज्ञानेन्द्रिय और पंच कर्मेन्द्रियका उल्लेख पीछे किया जा चुका है। ५—'प्राण'—पाँच हैं; प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान। ६—'गतभेदं'—परमात्मा सजातीय, विजातीय और स्वगत इन तीनों भेदोंसे रहित है। (१) अपनी जातिवालोंसे जो सम्बन्ध है, उसे सजातीय सम्बन्ध कहते हैं; जैसे एक मनुष्यका दूसरे मनुष्यसे सम्बन्ध। नित्य शुद्ध- बुद्ध चेतन और असंग परमात्माकी कोई जाति नहीं है, इसलिए वह सजातीय भेदसे रहित है। (२) अन्य-जातिवालोंसे जो सम्बन्ध है, उसे विजातीय सम्बन्ध कहते हैं; जैसे मनुष्यका पशुसे। (३) अपने अवयवों (अंगों) से जो सम्बन्ध है उसे स्वगत सम्बन्ध कहते हैं। जैसे हाथका सम्बन्ध पैरसे। गुसाईंजीने यही बात रामायणमें भी कही है :— सकल विकार रहित गतभेदा। कहि नित नेति निरूपहिं बेदा ॥