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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

विनय-पत्रिका १११ मिलनेवाले), दुर्द्धर्ष और कठिन दुःखोंको हरनेवाले हैं। ब्रह्माके पुत्र सनकादिकको अपनी परा और अपरा विद्याका बहुत गर्व था, उस गर्वका खर्व करनेवाले भी आप ही हैं ॥७॥ आप भक्तोंपर प्रसन्न रहनेवाले तथा सांसारिक दुःखोंको जड़से उखाड़ देनेवाले हैं। आपका नाम पापरूपी रूईको भस्म करनेके लिए अग्निके समान है। आप चंचल तृष्णारूपी अन्धकारको दूर करनेके लिए सूर्यरूप हैं, पृथिवीको धारण करनेवाले हैं, शरणागत जनोंका भय दूर करनेवाले तथा करुणा-निधान हैं ॥८॥ देव-समूह आपके दोनों चरणोंकी बहुत वन्दना किया करता है। आप मन्दारकी माला पहने रहते हैं। हे रावणके शत्रु श्रीरामजी ! सदैव सन्तापोंसे परिपूर्ण तुलसीदास आपको प्रणाम करता है। हे प्रभो ! मेरी रक्षा कीजिये ॥९॥ विशेष १—'शब्दादि'—शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये पाँचों पंच ज्ञाने- न्द्रियोंके विषय हैं। २—'गुण'—सत्त्व, रज और तम ये तीन गुण हैं। ३—'व्योम...उर्वी'—आकाश, वायु, तेज (अग्नि), जल और पृथिवी ये पाँच महाभूत हैं। इन्हीं पंचभूतोंसे सृष्टिकी उत्पत्ति हुई है। ४—'इन्द्रिय'—पंच ज्ञानेन्द्रिय और पंच कर्मेन्द्रियका उल्लेख पीछे किया जा चुका है। ५—'प्राण'—पाँच हैं; प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान। ६—'गतभेदं'—परमात्मा सजातीय, विजातीय और स्वगत इन तीनों भेदोंसे रहित है। (१) अपनी जातिवालोंसे जो सम्बन्ध है, उसे सजातीय सम्बन्ध कहते हैं; जैसे एक मनुष्यका दूसरे मनुष्यसे सम्बन्ध। नित्य शुद्ध- बुद्ध चेतन और असंग परमात्माकी कोई जाति नहीं है, इसलिए वह सजातीय भेदसे रहित है। (२) अन्य-जातिवालोंसे जो सम्बन्ध है, उसे विजातीय सम्बन्ध कहते हैं; जैसे मनुष्यका पशुसे। (३) अपने अवयवों (अंगों) से जो सम्बन्ध है उसे स्वगत सम्बन्ध कहते हैं। जैसे हाथका सम्बन्ध पैरसे। गुसाईंजीने यही बात रामायणमें भी कही है :— सकल विकार रहित गतभेदा। कहि नित नेति निरूपहिं बेदा ॥

११२ विनय-पत्रिका

७—‘सर्प-स्रग’—ज्ञान-चक्षु खुल जानेपर मनुष्यकी प्राणिमात्रपर अभेद- दृष्टि हो जाती है और उसे ऐसा भान होने लगता है कि संसारकी प्रत्येक वस्तु- का कारण ईश्वर है। देखिये, भक्त मीराबाईके ज्ञान-चक्षु खुल गये थे। एक बार महाराणाने मीराका प्राण लेनेके लिए पिटारीमें बन्द कराकर एक विषधर सर्प भेजा। दासीने मीराके हाथमें सर्पकी पिटारी देते हुए कहा कि महाराणाने आपके लिए उपहार भेजा है। मीराने प्रसन्न होकर उस पिटारीको ले लिया और बड़े प्रेमसे उसे खोलकर सर्पको उठाते हुए कहा,—बड़ी सुन्दर माला है। इसे मैं अपने गिरिधरलालको चढ़ाऊँगी। भक्त-मीराके लिए वह सर्प मालाके रूपमें परिणत हो गया। जब यह समाचार महाराणाको मालूम हुआ तो वह बहुत क्रुद्ध हुए। सोचा, मीरा जादूगरनी है। इससे पहले भी वह मीराका प्राण लेनेके लिए कई उपाय कर चुके थे। यह निशाना चूक जानेपर उनके क्रोधकी सीमा न रही। वास्तवमें भावना बड़ी बलवान् वस्तु है। देखिये न, दृढ़ भावना और अभेददृष्टि ने सर्पको मालाके रूपमें परिणत कर दिया।

८—‘वनचर-ध्वज’—‘वन’ नाम ‘जल’ का है। जलमें चलनेवाला अर्थात् मकर है ध्वजपर जिसके; अर्थात् कामदेव।

९—‘वेदगर्भार्भकादभ्र...कर्ता’—एकबार सनकादिने अपने पिता ब्रह्मासे वेदान्तविषयक कुछ प्रश्न किया। सृष्टिके कार्यमें व्यस्त रहनेके कारण ब्रह्माजी शीघ्र उनके प्रश्नका उत्तर न दे सके। इससे सनकादिको अपने गुणका गर्व हुआ। ब्रह्माके स्मरण करते ही भगवान् विष्णु हंसका रूप धारण करके वहाँ प्रकट हो गये। उन्होंने तुरन्त ही सनकादिकका अभिमान चूर कर दिया। यही हंस भगवान् निम्बार्क सम्प्रदायके आदि आचार्य माने जाते हैं।

( ५५ )

देव— संत-संताप हर, विश्व विश्रामकर, राम कामारि, अभिरामकारी। सुद्ध बोधायतन, सच्चिदानन्दघन, सज्जनानंद-वर्धन, खरारी ॥१॥

विनय-पत्रिका ११३ सील-समता-भवन, विषमता-मति-समन, राम रामारमन, रावनारी। खङ्गकर, चर्मवर-वर्मधर, रुचिर कटि तून सर-सक्ति सारंगधारी ॥२॥ सत्यसंधान, निर्वानप्रद, सर्वहित, सर्वगुन-ज्ञान-विज्ञानसाली। सघन-तम-घोर-संसार-भर-सर्वरी- नाम दिवसेस खर-किरनमाली ॥३॥ तपन तीच्छन तरुन तीव्र तापघ्न, तप- रूप, तनभूप, तमपर, तपस्वी। मान-मद-मदन-मत्सर-मनोरथ-मथन, मोह-अंभोधि-मंदर, मनस्वी ॥४॥ वेद-विख्यात, वरदेस, वामन, विरज, विमल, वागीस, वैकुंठस्वामी। काम-क्रोधादिमर्दन, विवर्धन, छमा, सान्ति विग्रह, विहँगराज-गामी ॥५॥ परम पावन, पाप-पुंज-मुंजाटवी- अनल इव निमिष निर्मूलकर्त्ता। भुवन-भूषन, दूषनारि, भुवनेस, भू- नाथ, स्रुतिमाथ जय भुवन-भर्त्ता ॥६॥ अमल, अविचल, अकल, सकल, संतप्त-कलि- विकलता-भंजनानंदरासी। उरग-नायक-सयन, तरुन पङ्कज-नयन, छीरसागर-अयन, सर्ववासी ॥७॥ सिद्ध-कवि-कोविदानंद-दायक पद- द्वंद्व मंदात्ममनुजैर्दुरापं। यत्र संभूत अतिपूत जल सुरसरी दर्शनादेव अपहरति पापं ॥८॥ ८

११४ विनय-पत्रिका नित्य, निर्मुक्त, संयुक्त-गुन, निर्गुना- नंद, भगवंत, न्यामक, नियंता। विश्व-पोशन-भरन, विस्व-कारन-करन, सरन, तुलसीदास त्रास-हंता ॥९॥ शब्दार्थ—खङ्गकर = हाथमें तलवार। चर्मवर = श्रेष्ठ ढाल। वर्मधर = कवच धारण किये हुए। भर = अतिशय, सम्पूर्ण। सर्वरी = रात। तपन = तेज। तपरूप = तपोमय। तमपर = अविद्यासे परे। विवर्धन = विशेष वृद्धि करनेवाले। कोविद = विद्वान्। मंदात्म = पापी। दुराप = कठिनतासे प्राप्य। यत्र = जहाँसे। संभूत = उत्पन्न। दर्शनादेव = (दर्शनात् +एव) दर्शनसे अवश्यमेव। न्यामक = नियामक, कर्णधार, नियमोंके विधायक। नियंता = शासन करनेवाले। भावार्थ—हे देव श्रीराम! आप सन्तोंका सन्ताप हरनेवाले, विश्वको विश्राम देनेवाले तथा शिवजीको आनन्द देनेवाले हैं। आप शुद्ध-बुद्ध, सच्चिदा- नन्द घन हैं और साधुजनोंका आनन्द बढ़ानेके लिए खर नामक दैत्यके शत्रु हैं ॥१॥ हे राम, आप शील और समताके घर, वैषम्य बुद्धिके नाशक, लक्ष्मीके पति तथा रावणके शत्रु हैं। आप अपने हाथोंमें तलवार और सुन्दर ढाल लिये रहते हैं; आप कवच धारण किये हुए हैं तथा सुन्दर कमरमें तरकस कसे हुए हैं। आप बाण, शक्ति और धनुष धारण करनेवाले हैं ॥२॥ आप सत्य-संकल्प, मोक्षदाता, सबके हितकारी, सर्व-गुण-सम्पन्न तथा ज्ञान-विज्ञानशाली हैं। आपका नाम अज्ञानरूपी सघन अन्धकारसे पूर्ण घोर संसाररूपी रात्रिका नाश करनेके लिए प्रचण्ड किरणोंसे युक्त सूर्यके समान है ॥३॥ आप तीक्ष्ण तेजवाले, प्रबल एवं तीव्र दुःखोंके नाशक, राजाका शरीर धारण करनेपर भी तपस्याकी मूर्त्ति, अविद्यासे परे और तपस्वी हैं। आप मान, मद, काम, मत्सर, कामना और मोहरूपी समुद्रको मथनेके लिए मन्दराचल पर्वत हैं; आप मनस्वी भी हैं ॥४॥ आप वेदोंमें विख्यात, वरदायी देवताओंके स्वामी, वामन, विरक्त, निर्मल, सरस्वतीके अधी- श्वर, वैकुंठनाथ, काम-क्रोधादिके नाशक, क्षमाकी वृद्धि करनेवाले, शान्ति-मूर्त्ति और गरुडगामी हैं ॥५॥ आप परम पवित्र और पाप-पुंजरूपी मूँजके वनको अग्निके समान पलभरमें निर्मूल करनेवाले हैं। आप विश्व-ब्रह्माण्डके आभूषण, दूषण दैत्यके शत्रु, संसारके स्वामी, पृथिवीनाथ और वेदोंके मस्तक हैं। हे

विश्व-ब्रह्माण्डके अधीश्वर ! आपकी जय हो ॥६॥ आप मल-रहित, अविचल, कला-रहित, कलापूर्ण, कलिकालके तापसे तपे हुए प्राणियोंकी व्याकुलताका नाश करनेवाले तथा आनन्दकी राशि हैं। आप शेषनागके ऊपर सोते हैं, पूर्ण विक- सित कमलके समान नेत्रवाले हैं, क्षीरसागरमें रहते हैं तथा सबमें निवास करते हैं ॥७॥ सिद्धों, कवियों, और विद्वानोंको आनन्द देनेवाले आपके जो दोनों चरण हैं, वे पापी मनुष्योंके लिए अत्यन्त दुर्लभ हैं। जहाँसे (आपके जिन चरणोंसे) उत्पन्न होकर अत्यन्त पवित्र जलवती गंगाजी अपने दर्शनमात्रसे मनुष्यके सब पापोंको हर लेती हैं ॥८॥ आप नित्य, मुक्त, दिव्य गुण-युक्त, तीनों गुणोंसे रहित आनन्द-स्वरूप, षडैश्वर्यवान्, नियामक और सबपर शासन करनेवाले हैं। आप संसारका भरण-पोषण करनेवाले, विश्वके आदि कारण और आधार तथा शरणा- गत तुलसीदासके भयको हरनेवाले हैं ॥९॥

विशेष १—'अकल'—कला-रहित कहनेका यह अभिप्राय है कि परमात्मा (चन्द्रमा आदिकी तरह) घटते बढ़ते नहीं। २—'सकल'—कला-सहित कहनेका यह आशय है कि परमात्मा सोलहो कला युक्त अर्थात् पूर्ण तेज-स्वरूप हैं।

५६ ) देव— दनुजसूदन, दयासिन्धु, दम्भापहन, दहन, दुर्द्दोष, दुष्पापहर्त्ता । दुष्टतादमन, दमभवन, दुःखौघहर, दुर्ग दुर्वासना नासकर्त्ता ॥१॥ भूरिभूषन, भानुमंत, भगवंत, भव- भंजनाभयद, भुवनेसभारी। भावनातीत, भववंद्य, भवभक्तहित, भूमिउद्धरन, भूधरन-धारी ॥२॥

११६ विनय-पत्रिका वरद, वनदाम, वागीस, विस्वात्मा, विरज, वैकुंठ-मन्दिर-बिहारी । व्यापकं व्योम, वंदारु, वामन, विभो, ब्रह्मविद् , ब्रह्म, चिंतापहारी ॥३॥ सहज सुंदर, सुमुख, सुमन, सुभ सर्वदा, सुद्ध सर्वज्ञ, स्वच्छंदचारी । सर्वकृत, सर्वभृत, सर्वजित, सर्वहित, सत्य-संकल्प, कल्पांतकारी ॥४॥ नित्य, निर्मोह, निर्गुन, निरंजन, निजानंद निर्वान, निर्वानदाता । निर्भरानंद, निःकंप, निःसीम, निर्मुक्त, निरुपाधि, निर्मम, विधाता ॥५॥ महामंगलमूल, मोद-महिमायतन, मुग्ध-मधु-मथन, मानद, अमानी । मदनमर्दन, मदातीत, मायारहित, मंजु मानाथ, पाथोज-पानी ॥६॥ कमल-लोचन, कलाकोस, कोदंडधर, कोसलाधीस, कल्यानरासी । जातुधान-प्रचुर मत्तकरि-केसरी, भक्तमन-पुन्य-आरन्यवासी ॥७॥ अनघ, अद्वैत, अनवद्य, अव्यक्त, अज, अमित, अविकार आनंदसिंधो । अचल, अनिकेत, अविरल, अनामय, अनारंभ, अंभोदनादहन-बंधो ॥८॥ दास तुलसी खेद खिन्न, आपन्न इह, सोक-संपन्न, अतिसय सभीतं । प्रनत पालक राम, परम करुनाधाम, पाहि मामुर्विपति, दुर्विनीतं ॥९॥

विनय-पत्रिका ११७ शब्दार्थ - दुर्देोष = बुरे ऐव, बड़े दुर्गुण। दमभवन = बाह्येन्द्रिय निग्रह। दुःखौघहर = दुःख-समूहको हरनेवाले। भूरि = बहुत । भुवनेस = ब्रह्मा आदि। भव = शिवजी । मुग्ध = मूढ़। मानाथ = (मा+नाथ) लक्ष्मीके पति । पानी = पाणि, हाथ । अनिकेत = गृहरहित । अनामय = रोगादि रहित । अंभोदनाद = मेघनाद । मामुर्विपति = (माम् + उर्वि + पति) पृथिवीपति मुझे । भावार्थ - हे देव ! आप दैत्योंके नाशकर्ता, दयाके समुद्र, दम्भ-विनाशक, महान्-दोषोंको भस्म करनेवाले तथा महान्-पापोंको हरनेवाले हैं। आप दुष्टताका दमन करनेवाले, इन्द्रिय-निग्रहके स्थान (जितेन्द्रियोंमें श्रेष्ठ); दुःखसमूहको हरने- वाले और कठिन दुर्वासनाओंके नाशकर्ता हैं ॥१॥ आप बहुत-से आभूषणोंको धारण करनेवाले, सूर्यके समान प्रभावान्, ऐश्वर्यवाले, संसारके जन्म-मरणका भंजन करके अभयवर देनेवाले तथा ब्रह्मा आदिसे भी बड़े हैं। आप भावनाओं- से परे, शिवजी द्वारा वन्दनीय, शिवभक्तोंके हितकारी, पृथिवीका उद्धार करनेवाले तथा गिरिवर-(गोवर्द्धन) धारी हैं ॥२॥ हे विभो ! आप वरदाता, मेघकी आभा- वाले, वाणीसे परे, विश्वकी आत्मा, विरक्त, वैकुण्ठ-मन्दिर-विहारी, आकाशकी तरह घट-घटमें व्यापक, वन्दनीय, वामन, ब्रह्म (वेद) वेत्ता, साक्षात् ब्रह्म, और चिन्ताओंको दूर करनेवाले हैं ॥३॥ आप सहज (स्वाभाविक ही) सुन्दर हैं, आपका सुन्दर मुख है और मन भी सुन्दर है। आप सदैव मंगळरूप, शुद्ध, और सर्वज्ञ तथा स्वच्छन्द विचरण करनेवाले हैं। आप सब कुछ करनेवाले, सबका भरण-पोषण करनेवाले, सर्वजित्, सबके हितू, सत्य-संकल्प तथा प्रलय करनेवाले हैं ॥४॥ आप नित्य हैं, मोह-रहित हैं, निर्गुण हैं, निरंजन हैं, अपनेमें ही आनन्द करनेवाले हैं, मोक्ष-स्वरूप हैं और मुक्तिदाता हैं। आप पूर्ण आनन्दरूप, अचल, मर्यादा-रहित, सर्वदा मुक्त, उपाधि-रहित तथा सबके विधानकर्ता या उत्पादक हैं ॥५॥ आप बड़े-बड़े कल्याणोंके आदिकारण, आनन्द और महिमाके घर, मूढ़ मधु दैत्यको मारनेवाले, सम्मानदाता तथा स्वयं मान-रहित हैं। आप कामदेवके नाशक, मदसे परे, माया-रहित, मनोहारिणी लक्ष्मीजीके स्वामी तथा हाथमें कमल लिये रहनेवाले हैं ॥६॥ आप कमलनेत्र हैं, कलाओंके भाण्डार हैं, धनुषधारी कोशलाधीश हैं, कल्याण-राशि हैं, अगणित राक्षसरूपी मतवाले हाथियोंके लिए सिंह हैं तथा भक्तोंके मनरूपी पवित्र वनमें निवास करनेवाले

११८ विनय-पत्रिका हैं ॥७॥ हे आनन्दसिन्धो ! आप पाप-रहित, अद्वैत, दूषण-रहित, अव्यक्त, अजन्मा, अमित तथा षट्विकार-रहित हैं। हे मेघनादको मारनेवाले लक्ष्मणजीके भ्राता ! आप अचल, गृह-रहित, अविरल, रोगादि-रहित तथा अनादि हैं ॥८॥ सांसारिक दुःखोंसे खिन्न हुआ यह तुलसीदास शोकसे परिपूर्ण तथा अत्यन्त भयभीत हो रहा है। हे प्रणत-पालक श्रीरामजी ! आप परम कारुणिक हैं। हे पृथिवीनाथ ! मुझ दुर्विनीतकी रक्षा कीजिये ॥९॥ विशेष १—'भूधरनधारी'—जिस समय देवराज इन्द्रने कुपित होकर ब्रजपर मूसलधार वृष्टि की थी, उस समय भगवान् श्रीकृष्णने गो-गोपोंकी रक्षा करनेके लिए गोवर्धन पर्वतको छत्रकी भाँति अँगुलीपर उठाकर उनकी रक्षा की थी। तभीसे श्रीकृष्णका नाम गिरिधारी पड़ गया। गोस्वामीजीने श्रीरामको भूधरन- धारी कहकर रामावतार और कृष्णावतारमें अभेद सिद्ध किया है। ( ५७ ) देव— देहि सतसंग निज अंग श्रीरंग ! भव भंग कारन सरन-सोकहारी । ये तु भवदंघ्रिपल्लव-समाश्रित सदा, भक्तिरत, विगतसंसय, मुरारी ॥१॥ असुर-सुर, नाग-नर, जच्छ-गन्धर्व खग, रजनिचर, सिद्ध, ये चापि अन्ने । संत-संसर्ग त्रैवर्गपर परमपद, प्राप्य निःप्राप्यगति त्वयि प्रसन्ने ॥२॥ वृत्र, बलि, बान, प्रह्लाद, मय, व्याध, गज, गृद्ध, द्विजबन्धु, निजधर्म-त्यागी । साधुपद-सलिल निर्धूत-कलमष सकल, श्वपच-जवनादि कैवल्य-भागी ॥३॥

विनय-पत्रिका १११ संत निरपेच्छ, निर्मम, निरामय, अगुन, सब्द ब्रह्मौकपर, ब्रह्मज्ञानी । दच्छ, समदृक, स्वदृक, विगत अति खपर मति, परमरति विरति तव चक्रपानी ॥४॥ विश्व उपकारहित व्यग्र चित सर्वदा, त्यक्त मदमन्यु, कृत पुन्यरासी । यत्र तिष्ठन्ति तत्रैव अज सर्व हरि सहित गच्छन्ति छीराब्धिवासी ॥५॥ वेद-पयसिंधु, सुविचार मंदर महा, अखिल-मुनिवृंद निर्मथनकर्ता । सार सतसंगमुद्धृत्य इति निश्चितं वदति श्रीकृष्ण वैदर्भि भर्ता ॥६॥ सोक-संदेह, भय-हर्ष, तम-तर्षगन साधु-सद्युक्ति विच्छेदकारी । जथा रघुनाथ-सायक निसाचर-चमू- निचय-निर्दलन-पटु वेग भारी ॥७॥ यत्र कुत्रापि मम जन्म निज कर्मबस, भ्रमत जगजोनि संकट अनेकम् । तत्र त्वद्भक्ति-सज्जन, समागम, सदा भवतु मे राम विश्राममेकम् ॥८॥ प्रबल भव-जनित त्रैव्याधि-भैषज भगति, भक्त भैषज्यमद्वैत दरसी । संत-भगवंत अंतर निरंतर नहीं, किमपि मति मलिन कह दासतुलसी ॥९॥ शब्दार्थ—श्रीरंग = भगवान्‌का नाम है, वृन्दावनमें श्रीरंगजीका मन्दिर बहुत प्रसिद्ध है। भवदंघ्रि = (भवत्+अंघ्रि) आपके चरण। चापि = (च+अपि) और भी। अन्ने = दूसरे। त्रैवर्गपर = त्रिवर्ग यानी अर्थ, धर्म, कामसे परे। द्विज = अजामिल। निर्धूत = स्वच्छ, धुला हुआ। समदृक = समभावसे देखनेवाला। स्वदृक = आत्मदर्शी। मदमन्यु = अहंकार और

क्रोध। तिष्ठन्ति = रहते हैं। तत्रैव = वहीं। अज = ब्रह्मा। सर्व = शर्व, शिव। पय = दूध। उद्धृत्य = निकालकर। वैदर्भि = रुक्मिणी। भर्ता = पति। तर्पणन = वासनाएँ। चमू = सेना। भैषज्य = वैद्य। भावार्थ-हे देव श्रीरंगजी ! मुझ शरणागतको अपना अंग-स्वरूप सत्संग दीजिये, क्योंकि वह संसार-चक्रसे छुड़ानेवाला तथा शोकका हरनेवाला है। हे मुरारी ! जो लोग सदा आपके चरण-पल्लवके भरोसे रहते हैं और आपके चरणोंकी भक्तिमें रत रहते हैं, वे संशयमुक्त हो जाते हैं ॥१॥ दैत्य, देवता, नाग, मनुष्य, यक्ष, गन्धर्व, पक्षी, राक्षस, सिद्ध तथा और भी जितने दूसरे जीव हैं, वे सब सन्तोंके संसर्गसे अर्थ, धर्म, कामसे परे उस अप्राप्य परमपदको प्राप्त कर लेते हैं, जो केवल आपके ही प्रसन्न होनेपर मिलता है ॥२॥ वृत्रासुर, बलि, बाणासुर, प्रह्लाद, मय, धर्म नामक व्याध, गजेन्द्र, गिद्ध (जटायु) स्वधर्मत्यागी अजामिल, चांडाल, यवन आदि (पापी) सन्तोंके चरणोदकसे अपने सब पापों- को धोकर कैवल्य पदके अधिकारी हो गये ॥३॥ जो शान्त, निरपेक्ष (आकांक्षा- रहित), मोह-ममतारहित, काम-क्रोधरूपी रोगसे रहित, त्रिगुणरहित केवल शब्दब्रह्म अर्थात् वेदोंमें परायण और ब्रह्मज्ञानी हैं, जो (ज्ञान, भक्ति, वैराग्य आदिमें) कुशल समदर्शी, आत्मदर्शी या अपनी-परायी बुद्धिसे बिलकुल मुक्त हैं, हे चक्रपाणे ! जिनमें आपके प्रति परम भक्ति और संसारके प्रति विरक्तिका भाव है ॥४॥ जो संसारके उपकारार्थ सदा व्यग्र-चित्त हैं, मद और क्रोधको त्यागकर पुण्य-राशि हैं, ऐसे महात्मा जहाँ रहते हैं, वहीं ब्रह्मा और शिवके सहित क्षीर- सागरवासी भगवान् विष्णु पहुँच जाते हैं ॥५॥ चारों वेद दुग्ध-समुद्र हैं, उनका उत्तम विचार मन्दराचल पर्वत है और समस्त मुनियोंका समूह उसे मथनेवाला है। मथनेपर सत्संगरूपी सार (अमृत) निकला। यह सिद्धान्त रुक्मिणीपति भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं ॥६॥ साधुओंकी अच्छी युक्तियाँ शोक, सन्देह, भय- हर्ष, अज्ञान और वासनाओंको इस प्रकार विच्छिन्न कर देती हैं, जैसे रघुनाथजी- के बाण राक्षसोंकी सेनाके समूहको नष्ट करनेमें कुशल और महान् वेगवान हैं ॥७॥ हे देव श्रीरामजी ! अपने कर्मानुसार संसारकी अनेक संकटापन्न योनियोंमें घूमता हुआ जहाँ कहीं भी मेरा जन्म हो, वहाँ आपकी भक्ति और सन्तोंका समागम मुझे सदा प्राप्त हो; बस यही मेरा प्रधान विश्राम हो ॥८॥ घोर संसार

विनय-पत्रिका १२१ जन्म-रूपी त्रिविध रोगोंके लिए भक्ति ही दवा है और अद्वैतदर्शी अर्थात् परमेश्वर- के सिवा दूसरा कोई भी पदार्थ न देखनेवाला भक्त (साधु) ही वैद्य है । मलिनबुद्धि तुलसीदास कहता है कि सन्त और भगवान्‌में कभी किंचित् भी भेद नहीं है ॥९॥ विशेष १—'वृत्रासुर' नामक असुर बड़ा प्रतापी और परमभक्त था । इसका वध करनेके लिए देवता लोग दधीचिके पास उनकी हड्डी माँगने गये थे और उस परमदानी ऋषिने देवलोकके उपकारार्थ अपने शरीरका त्याग किया था । उनकी एक हड्डीसे इन्द्रका वज्र बना था और उसीसे इन्द्रने वृत्रासुरको मारा था । २—'बाणासुर'—राजा बलिका पुत्र था । इसके हजार भुजाएँ थीं । यह शिवभक्त था । इसकी पुत्री ऊषा स्वप्नमें भगवान् श्रीकृष्णके पौत्र अनिरुद्धका रूप देखकर मोहित हो गयी थी । उसने अपनी सखी चित्रलेखा द्वारा पता लगाकर अनिरुद्धको अन्तःपुरमें बुला लिया । यह बात मालूम होते ही बाणा- सुरने उन्हें कैद कर लिया । इसके लिए बाणासुर और श्रीकृष्णमें घोर संग्राम हुआ । इस युद्धमें बाणासुरकी ओरसे शिवजी भी लड़े थे । जब बाणासुरके सब हाथ कट गये, सिर्फ चार हाथ शेष रहे, तब वह ईश्वर-भक्त हो गया । शिवजीके अनुरोधसे भगवान्‌ने उसे अभय कर दिया । यह कथा श्रीमद्भागवतमें है । ३—'मय' नामक दैत्यके कला-कौशलकी प्रशंसा महाभारत, रामायण आदि ग्रंथोंमें मिलती है । लंकाका निर्माण इसीने किया था । महाभारतकालीन इन्द्र- प्रस्थके अपूर्व नगरका निर्माता भी यही था । यह ईश्वरका भक्त था । ४—'द्विजबन्धु' अजामिलके लिए आया है । यह बड़ा पापी ब्राह्मण था । इसके छोटे लड़के का नाम नारायण था । मरते समय इसने भयभीत होकर अपने पुत्रको 'नारायण' कहकर पुकारा था । इससे उसका उद्धार हो गया । ५—'जवनादि'—४६ पदके विशेषमें देखिये । ६—'संत भगवंत' सन्त-महिमापर सुन्दर कविने खूब कहा है:— साँचो उपदेश देत भली भली सीख देत समता सुबुद्धि देत कुमति हरतु हैं । मारग दिखाय देत भावहु भगति देत प्रेमकी प्रतीति देत अभरा भरतु हैं ॥

१२२ विनय-पत्रिका ज्ञान देत ध्यान देत आतम विचार देत ब्रह्मको बताइ देत ब्रह्म में चतुर हैं। सुन्दर कहत जग संत कछु देत नाहीं संतजन निसिदिन देवोई करतु हैं ॥ ( ५८ ) देव— देहि अवलंब करकमल, कमलारमन, दमन-दुख, समन-संतापभारी ! अज्ञान-राकेस-ग्रासन विधुंतुद गर्व- काम-करिमत्त-हरि, दूपनारी ॥१॥ वपुष ब्रह्मांड सुप्रवृत्ति लंका-दुर्ग, रचित मन दनुज मय-रूपधारी । विविध कोसौघ, अति रुचिर मंदिर-निकर, सत्वगुन प्रमुख त्रैकटककारी ॥२॥ कुनप-अभिमान सागर भयंकर घोर, विपुल अवगाह, दुस्तर अपारं । नक्र-रागादि-संकुल मनोरथ सकल, संग-संकल्प बीची-विकारं ॥३॥ मोह दसमौलि, तद्भ्रात अहँकार, पाकारिजित काम विश्रामहारी । लोभ अतिकाय, मत्सर महोदर दुष्ट, क्रोध पापिष्ट विबुधांतकारी ॥४॥ द्वेष दुर्मुख, दंभ खर, अकंपन कपट, दर्प-मनुजाद मद-सूलपानी । अमित बल परम दुर्जय निसाचर-निकर, सहित षड्वर्ग गो-जातुधानी ॥५॥ जीव भवदंघ्रि-सेवक विभाषन बसत, मध्य दुष्टाटवी ग्रसित चिंता । नियम-यम सकल सुरलोक-लोकेस, लंकेस-वस नाथ ! अत्यंत भीता ॥६॥

विनय-पत्रिका १२३ ज्ञान-अवधेस-गृह-गेहिनी भक्ति सुभ, तत्र अवतार भूभार-हर्ता। भक्त-संकष्ट अवलोकि पितु-वाक्य कृत गमन किय गहन वैदेहि-भर्ता ॥७॥ कैवल्य-साधन अखिल भालु मर्कट, विपुल ज्ञान-सुग्रीवकृत जलधिसेतू। प्रबल वैराग्य दारुन प्रभंजन-तनय, विषय वन भवनमिव धूमकेतू ॥८॥ दुष्ट दनुजेस निर्वंसकृत दासहित, विस्वदुख - हरन बोधैकरासी। अनुज निज जानकी सहित हरि सर्वदा, दास तुलसी - हृदय - कमलवासी ॥९॥ शब्दार्थ—विधुंतुद = राहु। हरि = सिंह। कोसौघ = (कोश + ओघ) कोश समूह। कुनप = शरीर। अवगाह = अथाह। नक्र = मगर। संग = आसक्ति। संकुल = समूह। बीची = लहर। दसमौलि = रावण। तद्भ्रात = उसका भ्राता, कुम्भकर्ण। पाकारिजित = इन्द्रको जीतनेवाला, मेघनाद। विबुधांतकारी = देवान्तक राक्षस। षड्वर्ग = काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर। जातुधानी = राक्षसी। दुष्टाटवी = दुष्टोंका वन, दुष्ट-समुदाय। गहन = वन। मर्कट = वानर। प्रभंजन = वायु। तनय = पुत्र। बोधैक = मुख्य ज्ञान। अनुज = भाई (लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न)। भावार्थ—हे देव लक्ष्मीपते ! आप दुःखोंका नाश करनेवाले तथा महान् सन्तापोंको दूर करनेवाले हैं। मुझे अपने हस्तकमलका सहारा दीजिये। आप अज्ञानरूपी चन्द्रमाको ग्रसनेके लिए राहु हैं, गर्व और कामरूपी मतवाले हाथियों- के लिए सिंह तथा दूषण नामक असुरके शत्रु हैं ॥१॥ शरीररूपी ब्रह्माण्डमें प्रवृत्ति ही (अनेक विषयोंका ग्रहण ही) लंकाका किला है। मनरूपी मय दैत्यने इस प्रवृत्तिरूपी किलेका निर्माण किया है। इसमें जो अनेक कोष हैं, वे ही अत्यन्त सुन्दर मकान हैं और सत्त्व, रज, तम, ये तीनों प्रमुख सेनापति हैं ॥२॥ देहाभिमान ही भयंकर, कठिन, विपुल (अत्यन्त), अथाह, दुस्तर और अपार समुद्र है। उसमें राग-द्वेषादिसे पूर्ण जो मनोरथ हैं, वे ही जल-जन्तु (मगर,

१२४ विनय-पत्रिका घड़ियाल आदि) हैं और आसक्तिके संकल्प-विकल्प ही विकार-(वायु) जन्य लहरें हैं ॥३॥ (इस भीषण लंकापुरीमें) मोह (अपने स्वरूपको भूल जाना) रूपी रावण है, अहंकार (आग्रह-बुद्धि) ही उसका भाई कुम्भकर्ण है और विश्रामको हरनेवाली काम-चेष्टा ही मेघनाद है। लोभ ही अतिकाय (राक्षस) है, मत्सर ही दुष्ट महोदर है, क्रोध ही महापापी देवान्तक है ॥४॥ द्वेष ही दुर्मुख है, दम्भ ही खर है, कपट ही अकम्पन है, दर्प ही मनुजाद है और मद ही शूलपाणि है। ये सब अमित बलशाली और कठिनतासे जीतने योग्य हैं। इस षड्वर्ग निशा- चरोंके समूहके साथ दस इन्द्रियरूपी राक्षसियाँ हैं। (अर्थात् लोभादिरूपी असुरोंका रमण इन्द्रियरूपी स्त्रियोंमें होता है; इसीसे इन्द्रियों को राक्षसी कहा गया है। क्योंकि इन्द्रियोंकी प्रवृत्तिमें ही लोभादिकका विलास हुआ करता है।) ॥५॥ हे नाथ ! यह जीव ही आपके चरणोंका सेवक विभीषण है। यह बेचारा दुष्टोंके जंगलमें चिन्ताग्रस्त भावसे निवास कर रहा है। यम-नियमरूपी समस्त देवलोक और दिग्पाल इस रावणके अधीन होकर अत्यन्त भयभीत हो रहे हैं ॥६॥ अतः जैसे आपने पृथिवीका भार उतारनेके लिए दशरथजीके यहाँ कौशल्या- के गर्भसे अवतार लिया था, वैसे ही हे जानकीवल्लभ ! ज्ञानरूपी दशरथके घरमें शुभ शक्तिरूपी कौशल्याके गर्भसे प्रकट होइये और जैसे भक्तोंका कष्ट देखकर पिताकी आज्ञासे आप उस समय वनमें पधारे थे वैसे ही इस बार मेरे हृदयरूपी वनमें पधारिये ॥७॥ मोक्षके साधनोंको ही सम्पूर्ण रीछ बन्दरोंके समूह बनाकर ज्ञान (शास्त्रजन्य साधन) रूपी सुग्रीवको संगमें लेकर इनकी सहायतासे (देहाभिमान-रूपी) समुद्रका पुल बाँध दीजिये। फिर तो प्रबल वैराग्यरूपी महापराक्रमी पवनकुमार हनुमान्‌जी विषय (रस-गन्धादि) रूपी वन और महलों- के लिए अग्निके समान हो जायेंगे ॥८॥ हे बोध-स्वरूप श्रीरामजी ! हे संसारका दुःख दूर करनेवाले ! दासके लिए दुष्ट दैत्योंका निर्वंश करके तुलसीदासके हृदय-कमलमें अपने छोटे भाइयों और जानकीजीके सहित सदैव निवास कीजिये प्रभो ! ॥९॥ विशेष १—'वपुष ब्रह्मांड'—जिन पचीस तत्त्वोंसे शरीरकी रचना हुई है, उन्हीं तत्त्वोंसे ब्रह्मांडकी भी; इसीसे 'वपुष' को ब्रह्मांड कहना सर्वथा सार्थक है।

विनय-पत्रिका १२५ २—'विविध कोसौघ'—कोश पाँच हैं:—अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय । ३—'संग संकल्प'—संग अर्थात् आसक्तिसे ही सब दोष उत्पन्न होते हैं। गीतामें भगवान्‌ने कहा है कि संगसे काम, कामसे क्रोध, क्रोधसे संमोह, संमोहसे स्मृतिभ्रंश, स्मृतिभ्रंशसे बुद्धिनाश और बुद्धिनाशसे विनाश होता है। ४—इस समस्त पदमें गुसाईंजीका रूपक अलंकार सर्वथा सांगोपांग है। ( ५९ ) देव— दीन-उद्धरन रघुवर्य करुना भवन, समन-संताप, पापौघहारी। विमल विज्ञान-विग्रह, अनुग्रहरूप, भूपवर, विबुध-नर्मद, खरारी ॥१॥ संसार-कांतार अति घोर, गंभीर, घन, गहन तरुकर्म-संकुल, मुरारी। वासना बल्लि खर-कंटकाकुल विपुल, निविड़ विटपाटवी कठिन भारी ॥२॥ विविध चितवृत्ति-खग-निकर श्येनोल्लूक, काक बक गृध्र आमिष-अहारी। अखिल खल, निपुन छल, छिद्र निरखत सदा, जीवजन पथिक मन-खेदकारी ॥३॥ क्रोध करिमत्त, मृगराज कंदर्प, मद- दर्प वृक-भालु अति उग्रकर्मा। महिष मत्सर क्रूर, लोभ सूकर रूप, फेरु छल, दंभ मार्जारधर्मा ॥४॥ कपट मर्कट विकट, व्याघ्र पाखण्ड मुख, दुखद मृगव्रात, उत्पातकर्ता। हृदय अवलोकि यहु सोक सरनागतं, पाहि मां पाहि, भो विश्वभर्ता ॥५॥

१२६ विनय-पत्रिका प्रबल अहँकार दुरघट महीधर, महा- मोह गिरि-गुहा निविड़ांधकारं । चित्त बेताल, मनुजाद मन, प्रेतगन, रोग भोगौध वृश्चिक-विकारं ॥६॥ विषय-सुख-लालसा दंस-मसकादि, खल झिल्लि रूपादि सब सर्प, स्वामी । तत्र आक्षिप्त तव विषम माया नाथ, अंध मैं मंद, व्यालादगामी ॥७॥ घोर, अवगाह भव आपगा पाप जल- पूर, दुष्प्रेक्ष्य, दुस्तर, अपारा । मकर षड्वर्ग, गोनक्र-चक्राकुला, कूल सुभ-असुभ, दुख तीव्र धारा ॥८॥ सकल संघट पोच सोचवस सर्वदा, दास तुलसी विषम गहन-ग्रस्तं । त्राहि रघुबंस-भूषन कृपाकर, कठिन काल बिकराल-कलित्रास-त्रस्तं ॥९॥ शब्दार्थ—नर्मद = सुख देनेवाले । कांतार = वन । खर = तीक्ष्ण, नुकीले । श्येनोलोक = (श्येन+उलूक) बाज और उल्लू । आमिष = मांस । छिद्र = दोष । खेद = दुःख । कंदर्प = कामदेव । वृक = भेड़िया, हुँडार । महिष = भैंसा । फेरु = सियार । मार्जार = बिल्ली, बिलाव । ब्रात = समूह । मनुजाद = नरभक्षक, मनुष्यको खानेवाला । वृश्चिक = बिच्छू । आक्षिप्त = फेंक दिया है । आपगा = नदी । कूल = किनारा । पोच = नीचा । संघट = एकत्र । त्रास = भय । भावार्थ—हे देव ! आप दीनोंका उद्धार करनेवाले, रघुकुलमें श्रेष्ठ, करुणा- निधान, सन्तापोंका शमन करनेवाले तथा पाप-समूहको हर लेनेवाले हैं । आप विमल विज्ञान-शरीरवाले, कृपाके रूप, राजाओंमें श्रेष्ठ, देवताओंको सुख देनेवाले तथा खर नामक दैत्यके शत्रु हैं ॥१॥ हे मुरारी ! यह संसाररूपी वन बड़ा ही घोर, गम्भीर और सघन है । यह वन गहन कर्मरूपी वृक्षोंसे व्याप्त है। वासनाएँ ही लताएँ हैं और (इच्छा पूर्ण न होनेके कारण उत्पन्न हुई) व्याकुलता ही तीक्ष्ण काँटा-रूप है । मह कर्मरूपी वृक्षोंका वन बहुत बड़ा, कठिन तथा सघन

है ॥२॥ इसमें जो नाना प्रकारकी चित्त-वृत्तियाँ हैं, वे ही बाज, उल्लू, कौए, बगुले, गीध आदि मांसाहारी पक्षियोंके समूह हैं । ये सब बड़े दुष्ट और छल करनेमें कुशल हैं । ये सदैव छिद्र देखा करते हैं और जीवरूपी बटोहियोंके मनमें खेद उत्पन्न करनेवाले हैं ॥३॥ (इस संसार-वनमें) क्रोधरूपी मतवाले हाथी, कामरूपी सिंह, मद्रूपी हुँड़ार और गर्वरूपी रीछ ये सब बड़े ही उग्र कर्मवाले हैं । यहाँ मत्सररूपी क्रूर भैंसा, लोभरूपी शूकर और दम्भरूपी बिल्ली है ॥४॥ कपटरूपी विकट बन्दर हैं, पाखंडरूपी बाघ है जो कि मृगसमूहको दुःख देने- वाला तथा उत्पात करनेवाला है । हे प्रभो ! हृदयमें यह कष्ट देखकर आपकी शरणमें आया हूँ, मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये ॥५॥ इस संसार-वनमें प्रबल अहंकाररूपी दुर्घट पर्वत है और उसमें महामोहरूपी सघनान्धकार-पूर्ण पर्वत- गुफा है । यहाँ चित्तरूपी बेताल, मनरूपी नर-भक्षक दैत्य, रोग-स्वरूप प्रेतसमूह, भोग-समूहरूपी बिच्छू, विषय-सुखकी लालसारूपी मक्खियाँ और मच्छर हैं; दुष्ट ही झिल्ली हैं और पंचज्ञानेन्द्रियोंके पाँच विषय रूप-रसादि ही सर्प हैं । हे नाथ ! हे गरुडगामी ! तुम्हारी विषम मायाने वहाँ मुझ अन्धे और बुद्धिहीनको लाकर डाल दिया है ॥७॥ इस संसारमें पापरूपी जलसे परिपूर्ण (प्रवृत्तिरूपी) नदी है; यह घोर और अगाध नदी कठिनतासे देखने योग्य, मुश्किलसे पार करने योग्य तथा अपार (ओर-छोर-रहित) है। इसमें काम-क्रोधादिरूपी मगर, इन्द्रियरूपी घड़ियाल और भँवर भरे हुए हैं। इस नदीके शुभ और अशुभ कर्म- रूपी दोनों किनारे हैं तथा दुःखरूपी तीव्र धारा है ॥८॥ विषम-वन-ग्रस्त तुलसी- दास ऊपर कहे हुए नीचोंके जमघटसे सदैव चिन्तित रहता है । हे कृपाकी खानि रघुवंश-भूषण ! इस कठिन समयमें विकराल कलियुगके भयभीत मेरी रक्षा कीजिये ॥९॥

विशेष १—इसमें रूपक अलङ्कार है । गोस्वामीजी बहुत ही सुन्दर रूपक बाँधते थे । ऊपरके ही पदमें देखिये, संसारवनमें वृक्ष, लता, काँटे, अनेक प्रकारके पक्षी, अनेक तरहके दुष्ट तथा हिंस्र जीव इत्यादि सब-कुछ दिखलाया गया है । इतना ही नहीं, जिस वस्तुका जिस वस्तुसे रूपक बाँधा गया है, उसमें उसके लक्षण

१२८ विनय-पत्रिका भी खूब हैं। जैसे, कामको सिंह कहा गया है। आशय यह है कि जिस प्रकार सिंह सब पशुओंका नाश करता है, वैसे ही कामकी प्रबलतासे सब गुण नष्ट हो जाते हैं। कर्मोंकी उपमा वृक्षोंके साथ दी गयी है। जिस प्रकार वृक्ष अनेक प्रकारके होते हैं उसी प्रकार कर्मके भेद भी कई प्रकारके हैं, जैसे कर्म, अकर्म और विकर्म; अथवा संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण; अथवा सकामकर्म और निष्काम कर्म आदि। मत्सर को 'क्रूर महिष' कहा गया है। अर्थात् जिस प्रकार भैंसा किसीको व्यर्थ ही मारता है, पर मांस नहीं खाता, उसी प्रकार मत्सर- स्वभाव भी किसीका भला नहीं देखता। वह अपना कुछ भी लाभ न रहनेपर भी दूसरोंका अहित करता है। मनन करनेपर पाठकोंको प्रत्येक रूपकमें इसी प्रकारकी सार्थकता दिखलाई पड़ेगी। २—'रूपादि सब सर्प'—जिस प्रकार सर्प प्राणनाशक है, उसी प्रकार शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धादि विषय भी। जिन इन्द्रियोंके ये शब्दादि विषय हैं, उन इन्द्रियोंके सम्बन्धमें किसी विद्वान्ने क्या ही सुन्दर कहा है— पतंगमीनभृङ्गालयोलयं प्रयान्ति पंचेन्द्रियपंचगोचरैः। मयातु तत्पंचकमेव सेव्यते गतिर्न जाने मम का भविष्यति ॥ एते च जि क्षणनासिकादयश्चौरास्तु सश्रन् मम देहवासिनः । लुम्पन्ति सर्व्वात्मधनं प्रमाथिनो नाद्यप्यवेक्ष्ये मम पश्यताम्यताम् ॥ ३—'व्यालादगामी' कहनेका अभिप्राय यह है कि मैं रूप-रसादिरूपी सर्पोंके बीचमें पड़ा हुआ हूँ, अतः आप मेरी रक्षा कीजिये; क्योंकि आप सर्पको भक्षण करनेवाले गरुडपर चढ़कर चलनेवाले हैं। ( ६० ) देव— नौमि नारायनं, नरं करुनायनं, ध्यान-पारायनं, ज्ञान-मूलं। अखिल संसार-उपकार-कारन, सदय हृदय, तपनिरत, प्रनतानुकूलं ॥१॥

विनय-पत्रिका १२९ स्याम नव तामरस-दामद्युति वपुष, छवि- कोटि मदनार्क अगनित प्रकासं । तरुन रमनीय राजीव-लोचन ललित, वदन राकेस, कर-निकर हासं ॥२॥ सकल सौंदर्य-निधि, विपुल गुनधाम, विधि- वेद-बुध-संभु-सेवित, अमानं । अरुन पदकंज-मकरंद मंदाकिनी, मधुप-मुनिवृंद कुर्वन्ति पानं ॥३॥ सक्र-प्रेरित घोर मदन मद-भंगकृत क्रोधगत, बोधरत, ब्रह्मचारी । मारकंडेय मुनिवर्यहित कौतुकी, बिनहि कल्पांत प्रभु प्रलयकारी ॥४॥ पुन्य बन सैलसरि बदरिकाश्रम, सदा- सीन पद्मासनं, एक रूपं । सिद्ध-योगीन्द्र-वृन्दारकानन्दप्रद, भद्रदायक दरस अति अनूपं ॥५॥ मान मनभंग, चितभंग मद, क्रोध लोभादि पर्वत दुर्ग, भुवन-भर्त्ता । द्वेष-मत्सर-राग प्रबल प्रत्यूह प्रति, भूरि निर्दय, क्रूर-कर्म-कर्त्ता ॥६॥ विकटतर वक्र छुरधार प्रमदा, तीव्र दर्प कंदर्प खर खङ्गधारा । धीर-गंभीर-मन-पीर-कारक, तत्र के वराका वय विगत सारा ॥७॥ परम दुर्घट पंथ, खल-असंगत साथ, नाथ, नहिं हाथ वर विरति-यष्टी । दर्सनारत दास, त्रसित माया-पास, त्राहि हरि, त्राहि हरि, दास-कष्टी ॥८॥ ९

१३० विनय-पत्रिका दास तुलसी दीन धम-संबल हीन, श्रमित अति खेद, मति मोह नासी । देहि अवलंब न विलंब अंभोज-कर, चक्रधर तेजवल सर्मरासी ॥९॥

शब्दार्थ—पारायन = सम्पूर्णता, तत्पर । सदय = दयालु । माला = माला । मदन = कामदेव । अर्क = सूर्य । कुर्वन्ति = करते हैं । सक्र = इन्द्र । प्रत्यूह = विघ्न । प्रति = प्रत्येक । वक्र = टेढ़ । प्रमदा = स्त्री । तत्र = वहाँ । के = कौन, क्या । बराका = (वराक) गरीब । वय = हम । यष्टी = छड़ी, लाठी । पास = फन्दा । संबल = कलेवा, राह-खर्च । सर्म = (शर्म) कल्याण, सुख ।

भावार्थ—हे देव ! हे नर-नारायण ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ । आप ध्यान-परायण (अपने ही स्वरूपका ध्यान करते) हैं और ज्ञानके कारण हैं । आप समस्त संसारका हित करनेवाले, दयालु हृदयवाले, तपस्यामें लीन रहने- वाले और भक्तोंपर रहम करनेवाले हैं ॥१॥ आपके शरीरकी कान्ति नवीन नीले कमलके समान है, शोभा करोड़ों कामदेवके समान है और तेज अनन्त सूर्यके समान है । आपके नेत्र पूर्ण विकसित कमलके समान रमणीय हैं और सुन्दर मुखकी मुसकान चन्द्रमाकी किरणोंके सदृश है ॥२॥ आप सब प्रकारकी सुन्दरताके स्थान, अनन्त गुणनिधान और ब्रह्मा, वेद, पंडित तथा शिवजीके द्वारा सेवित होनेपर भी मान-रहित हैं । मुनि-वृन्दरूपी भौंरे आपके लाल कमलके समान चरणोंके मन्दाकिनीरूपी मकरन्दका पान करते हैं ॥३॥ आपने इन्द्रके भेजे हुए घोर कामदेवका मद चूर्ण किया है; आप क्रोध-रहित, ज्ञान-रत और ब्रह्मचारी हैं । हे प्रभो ! आपने बिना कल्पान्तके ही मार्कण्डेय मुनिको दिखानेके लिए प्रलयकरी लीला की थी ॥४॥ आप पवित्र वन, पर्वत और नदी-संयुक्त बदरिकाश्रममें सदैव पद्मासन लगाये एकरूपसे बैठे रहते हैं । आपका अत्यन्त अनुपम दर्शन सिद्ध, योगीन्द्र और देवताओंके लिए आनन्दप्रद और कल्याण- दायक है ॥५॥ हे भुवनेश्वर ! (आपके बदरिकाश्रमके मार्गमें 'मनभंग' और 'चित्तभंग' नामक पर्वत हैं जिन्हें देखकर बड़े-बड़े साहसी भी हिम्मत हारकर हिचकने लगते हैं) यहाँ अभिमान ही 'मनभंग' है, और मद, क्रोध, लोभादि, 'चित्तभंग' आदि दुर्गम पर्वत हैं । द्वेष, मत्सर और राग ही प्रबल विघ्न हैं और