विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२४ विनय-पत्रिका घड़ियाल आदि) हैं और आसक्तिके संकल्प-विकल्प ही विकार-(वायु) जन्य लहरें हैं ॥३॥ (इस भीषण लंकापुरीमें) मोह (अपने स्वरूपको भूल जाना) रूपी रावण है, अहंकार (आग्रह-बुद्धि) ही उसका भाई कुम्भकर्ण है और विश्रामको हरनेवाली काम-चेष्टा ही मेघनाद है। लोभ ही अतिकाय (राक्षस) है, मत्सर ही दुष्ट महोदर है, क्रोध ही महापापी देवान्तक है ॥४॥ द्वेष ही दुर्मुख है, दम्भ ही खर है, कपट ही अकम्पन है, दर्प ही मनुजाद है और मद ही शूलपाणि है। ये सब अमित बलशाली और कठिनतासे जीतने योग्य हैं। इस षड्वर्ग निशा- चरोंके समूहके साथ दस इन्द्रियरूपी राक्षसियाँ हैं। (अर्थात् लोभादिरूपी असुरोंका रमण इन्द्रियरूपी स्त्रियोंमें होता है; इसीसे इन्द्रियों को राक्षसी कहा गया है। क्योंकि इन्द्रियोंकी प्रवृत्तिमें ही लोभादिकका विलास हुआ करता है।) ॥५॥ हे नाथ ! यह जीव ही आपके चरणोंका सेवक विभीषण है। यह बेचारा दुष्टोंके जंगलमें चिन्ताग्रस्त भावसे निवास कर रहा है। यम-नियमरूपी समस्त देवलोक और दिग्पाल इस रावणके अधीन होकर अत्यन्त भयभीत हो रहे हैं ॥६॥ अतः जैसे आपने पृथिवीका भार उतारनेके लिए दशरथजीके यहाँ कौशल्या- के गर्भसे अवतार लिया था, वैसे ही हे जानकीवल्लभ ! ज्ञानरूपी दशरथके घरमें शुभ शक्तिरूपी कौशल्याके गर्भसे प्रकट होइये और जैसे भक्तोंका कष्ट देखकर पिताकी आज्ञासे आप उस समय वनमें पधारे थे वैसे ही इस बार मेरे हृदयरूपी वनमें पधारिये ॥७॥ मोक्षके साधनोंको ही सम्पूर्ण रीछ बन्दरोंके समूह बनाकर ज्ञान (शास्त्रजन्य साधन) रूपी सुग्रीवको संगमें लेकर इनकी सहायतासे (देहाभिमान-रूपी) समुद्रका पुल बाँध दीजिये। फिर तो प्रबल वैराग्यरूपी महापराक्रमी पवनकुमार हनुमान्जी विषय (रस-गन्धादि) रूपी वन और महलों- के लिए अग्निके समान हो जायेंगे ॥८॥ हे बोध-स्वरूप श्रीरामजी ! हे संसारका दुःख दूर करनेवाले ! दासके लिए दुष्ट दैत्योंका निर्वंश करके तुलसीदासके हृदय-कमलमें अपने छोटे भाइयों और जानकीजीके सहित सदैव निवास कीजिये प्रभो ! ॥९॥ विशेष १—'वपुष ब्रह्मांड'—जिन पचीस तत्त्वोंसे शरीरकी रचना हुई है, उन्हीं तत्त्वोंसे ब्रह्मांडकी भी; इसीसे 'वपुष' को ब्रह्मांड कहना सर्वथा सार्थक है।