विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका १२५ २—'विविध कोसौघ'—कोश पाँच हैं:—अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय । ३—'संग संकल्प'—संग अर्थात् आसक्तिसे ही सब दोष उत्पन्न होते हैं। गीतामें भगवान्ने कहा है कि संगसे काम, कामसे क्रोध, क्रोधसे संमोह, संमोहसे स्मृतिभ्रंश, स्मृतिभ्रंशसे बुद्धिनाश और बुद्धिनाशसे विनाश होता है। ४—इस समस्त पदमें गुसाईंजीका रूपक अलंकार सर्वथा सांगोपांग है। ( ५९ ) देव— दीन-उद्धरन रघुवर्य करुना भवन, समन-संताप, पापौघहारी। विमल विज्ञान-विग्रह, अनुग्रहरूप, भूपवर, विबुध-नर्मद, खरारी ॥१॥ संसार-कांतार अति घोर, गंभीर, घन, गहन तरुकर्म-संकुल, मुरारी। वासना बल्लि खर-कंटकाकुल विपुल, निविड़ विटपाटवी कठिन भारी ॥२॥ विविध चितवृत्ति-खग-निकर श्येनोल्लूक, काक बक गृध्र आमिष-अहारी। अखिल खल, निपुन छल, छिद्र निरखत सदा, जीवजन पथिक मन-खेदकारी ॥३॥ क्रोध करिमत्त, मृगराज कंदर्प, मद- दर्प वृक-भालु अति उग्रकर्मा। महिष मत्सर क्रूर, लोभ सूकर रूप, फेरु छल, दंभ मार्जारधर्मा ॥४॥ कपट मर्कट विकट, व्याघ्र पाखण्ड मुख, दुखद मृगव्रात, उत्पातकर्ता। हृदय अवलोकि यहु सोक सरनागतं, पाहि मां पाहि, भो विश्वभर्ता ॥५॥