भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 137

१२६ विनय-पत्रिका प्रबल अहँकार दुरघट महीधर, महा- मोह गिरि-गुहा निविड़ांधकारं । चित्त बेताल, मनुजाद मन, प्रेतगन, रोग भोगौध वृश्चिक-विकारं ॥६॥ विषय-सुख-लालसा दंस-मसकादि, खल झिल्लि रूपादि सब सर्प, स्वामी । तत्र आक्षिप्त तव विषम माया नाथ, अंध मैं मंद, व्यालादगामी ॥७॥ घोर, अवगाह भव आपगा पाप जल- पूर, दुष्प्रेक्ष्य, दुस्तर, अपारा । मकर षड्वर्ग, गोनक्र-चक्राकुला, कूल सुभ-असुभ, दुख तीव्र धारा ॥८॥ सकल संघट पोच सोचवस सर्वदा, दास तुलसी विषम गहन-ग्रस्तं । त्राहि रघुबंस-भूषन कृपाकर, कठिन काल बिकराल-कलित्रास-त्रस्तं ॥९॥ शब्दार्थ—नर्मद = सुख देनेवाले । कांतार = वन । खर = तीक्ष्ण, नुकीले । श्येनोलोक = (श्येन+उलूक) बाज और उल्लू । आमिष = मांस । छिद्र = दोष । खेद = दुःख । कंदर्प = कामदेव । वृक = भेड़िया, हुँडार । महिष = भैंसा । फेरु = सियार । मार्जार = बिल्ली, बिलाव । ब्रात = समूह । मनुजाद = नरभक्षक, मनुष्यको खानेवाला । वृश्चिक = बिच्छू । आक्षिप्त = फेंक दिया है । आपगा = नदी । कूल = किनारा । पोच = नीचा । संघट = एकत्र । त्रास = भय । भावार्थ—हे देव ! आप दीनोंका उद्धार करनेवाले, रघुकुलमें श्रेष्ठ, करुणा- निधान, सन्तापोंका शमन करनेवाले तथा पाप-समूहको हर लेनेवाले हैं । आप विमल विज्ञान-शरीरवाले, कृपाके रूप, राजाओंमें श्रेष्ठ, देवताओंको सुख देनेवाले तथा खर नामक दैत्यके शत्रु हैं ॥१॥ हे मुरारी ! यह संसाररूपी वन बड़ा ही घोर, गम्भीर और सघन है । यह वन गहन कर्मरूपी वृक्षोंसे व्याप्त है। वासनाएँ ही लताएँ हैं और (इच्छा पूर्ण न होनेके कारण उत्पन्न हुई) व्याकुलता ही तीक्ष्ण काँटा-रूप है । मह कर्मरूपी वृक्षोंका वन बहुत बड़ा, कठिन तथा सघन