भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 138

है ॥२॥ इसमें जो नाना प्रकारकी चित्त-वृत्तियाँ हैं, वे ही बाज, उल्लू, कौए, बगुले, गीध आदि मांसाहारी पक्षियोंके समूह हैं । ये सब बड़े दुष्ट और छल करनेमें कुशल हैं । ये सदैव छिद्र देखा करते हैं और जीवरूपी बटोहियोंके मनमें खेद उत्पन्न करनेवाले हैं ॥३॥ (इस संसार-वनमें) क्रोधरूपी मतवाले हाथी, कामरूपी सिंह, मद्रूपी हुँड़ार और गर्वरूपी रीछ ये सब बड़े ही उग्र कर्मवाले हैं । यहाँ मत्सररूपी क्रूर भैंसा, लोभरूपी शूकर और दम्भरूपी बिल्ली है ॥४॥ कपटरूपी विकट बन्दर हैं, पाखंडरूपी बाघ है जो कि मृगसमूहको दुःख देने- वाला तथा उत्पात करनेवाला है । हे प्रभो ! हृदयमें यह कष्ट देखकर आपकी शरणमें आया हूँ, मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये ॥५॥ इस संसार-वनमें प्रबल अहंकाररूपी दुर्घट पर्वत है और उसमें महामोहरूपी सघनान्धकार-पूर्ण पर्वत- गुफा है । यहाँ चित्तरूपी बेताल, मनरूपी नर-भक्षक दैत्य, रोग-स्वरूप प्रेतसमूह, भोग-समूहरूपी बिच्छू, विषय-सुखकी लालसारूपी मक्खियाँ और मच्छर हैं; दुष्ट ही झिल्ली हैं और पंचज्ञानेन्द्रियोंके पाँच विषय रूप-रसादि ही सर्प हैं । हे नाथ ! हे गरुडगामी ! तुम्हारी विषम मायाने वहाँ मुझ अन्धे और बुद्धिहीनको लाकर डाल दिया है ॥७॥ इस संसारमें पापरूपी जलसे परिपूर्ण (प्रवृत्तिरूपी) नदी है; यह घोर और अगाध नदी कठिनतासे देखने योग्य, मुश्किलसे पार करने योग्य तथा अपार (ओर-छोर-रहित) है। इसमें काम-क्रोधादिरूपी मगर, इन्द्रियरूपी घड़ियाल और भँवर भरे हुए हैं। इस नदीके शुभ और अशुभ कर्म- रूपी दोनों किनारे हैं तथा दुःखरूपी तीव्र धारा है ॥८॥ विषम-वन-ग्रस्त तुलसी- दास ऊपर कहे हुए नीचोंके जमघटसे सदैव चिन्तित रहता है । हे कृपाकी खानि रघुवंश-भूषण ! इस कठिन समयमें विकराल कलियुगके भयभीत मेरी रक्षा कीजिये ॥९॥

विशेष १—इसमें रूपक अलङ्कार है । गोस्वामीजी बहुत ही सुन्दर रूपक बाँधते थे । ऊपरके ही पदमें देखिये, संसारवनमें वृक्ष, लता, काँटे, अनेक प्रकारके पक्षी, अनेक तरहके दुष्ट तथा हिंस्र जीव इत्यादि सब-कुछ दिखलाया गया है । इतना ही नहीं, जिस वस्तुका जिस वस्तुसे रूपक बाँधा गया है, उसमें उसके लक्षण

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