भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 134

विनय-पत्रिका १२३ ज्ञान-अवधेस-गृह-गेहिनी भक्ति सुभ, तत्र अवतार भूभार-हर्ता। भक्त-संकष्ट अवलोकि पितु-वाक्य कृत गमन किय गहन वैदेहि-भर्ता ॥७॥ कैवल्य-साधन अखिल भालु मर्कट, विपुल ज्ञान-सुग्रीवकृत जलधिसेतू। प्रबल वैराग्य दारुन प्रभंजन-तनय, विषय वन भवनमिव धूमकेतू ॥८॥ दुष्ट दनुजेस निर्वंसकृत दासहित, विस्वदुख - हरन बोधैकरासी। अनुज निज जानकी सहित हरि सर्वदा, दास तुलसी - हृदय - कमलवासी ॥९॥ शब्दार्थ—विधुंतुद = राहु। हरि = सिंह। कोसौघ = (कोश + ओघ) कोश समूह। कुनप = शरीर। अवगाह = अथाह। नक्र = मगर। संग = आसक्ति। संकुल = समूह। बीची = लहर। दसमौलि = रावण। तद्भ्रात = उसका भ्राता, कुम्भकर्ण। पाकारिजित = इन्द्रको जीतनेवाला, मेघनाद। विबुधांतकारी = देवान्तक राक्षस। षड्वर्ग = काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर। जातुधानी = राक्षसी। दुष्टाटवी = दुष्टोंका वन, दुष्ट-समुदाय। गहन = वन। मर्कट = वानर। प्रभंजन = वायु। तनय = पुत्र। बोधैक = मुख्य ज्ञान। अनुज = भाई (लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न)। भावार्थ—हे देव लक्ष्मीपते ! आप दुःखोंका नाश करनेवाले तथा महान् सन्तापोंको दूर करनेवाले हैं। मुझे अपने हस्तकमलका सहारा दीजिये। आप अज्ञानरूपी चन्द्रमाको ग्रसनेके लिए राहु हैं, गर्व और कामरूपी मतवाले हाथियों- के लिए सिंह तथा दूषण नामक असुरके शत्रु हैं ॥१॥ शरीररूपी ब्रह्माण्डमें प्रवृत्ति ही (अनेक विषयोंका ग्रहण ही) लंकाका किला है। मनरूपी मय दैत्यने इस प्रवृत्तिरूपी किलेका निर्माण किया है। इसमें जो अनेक कोष हैं, वे ही अत्यन्त सुन्दर मकान हैं और सत्त्व, रज, तम, ये तीनों प्रमुख सेनापति हैं ॥२॥ देहाभिमान ही भयंकर, कठिन, विपुल (अत्यन्त), अथाह, दुस्तर और अपार समुद्र है। उसमें राग-द्वेषादिसे पूर्ण जो मनोरथ हैं, वे ही जल-जन्तु (मगर,