विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 133, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ें१२२ विनय-पत्रिका ज्ञान देत ध्यान देत आतम विचार देत ब्रह्मको बताइ देत ब्रह्म में चतुर हैं। सुन्दर कहत जग संत कछु देत नाहीं संतजन निसिदिन देवोई करतु हैं ॥ ( ५८ ) देव— देहि अवलंब करकमल, कमलारमन, दमन-दुख, समन-संतापभारी ! अज्ञान-राकेस-ग्रासन विधुंतुद गर्व- काम-करिमत्त-हरि, दूपनारी ॥१॥ वपुष ब्रह्मांड सुप्रवृत्ति लंका-दुर्ग, रचित मन दनुज मय-रूपधारी । विविध कोसौघ, अति रुचिर मंदिर-निकर, सत्वगुन प्रमुख त्रैकटककारी ॥२॥ कुनप-अभिमान सागर भयंकर घोर, विपुल अवगाह, दुस्तर अपारं । नक्र-रागादि-संकुल मनोरथ सकल, संग-संकल्प बीची-विकारं ॥३॥ मोह दसमौलि, तद्भ्रात अहँकार, पाकारिजित काम विश्रामहारी । लोभ अतिकाय, मत्सर महोदर दुष्ट, क्रोध पापिष्ट विबुधांतकारी ॥४॥ द्वेष दुर्मुख, दंभ खर, अकंपन कपट, दर्प-मनुजाद मद-सूलपानी । अमित बल परम दुर्जय निसाचर-निकर, सहित षड्वर्ग गो-जातुधानी ॥५॥ जीव भवदंघ्रि-सेवक विभाषन बसत, मध्य दुष्टाटवी ग्रसित चिंता । नियम-यम सकल सुरलोक-लोकेस, लंकेस-वस नाथ ! अत्यंत भीता ॥६॥