भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 123, कुल 475 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 123

११२ विनय-पत्रिका

७—‘सर्प-स्रग’—ज्ञान-चक्षु खुल जानेपर मनुष्यकी प्राणिमात्रपर अभेद- दृष्टि हो जाती है और उसे ऐसा भान होने लगता है कि संसारकी प्रत्येक वस्तु- का कारण ईश्वर है। देखिये, भक्त मीराबाईके ज्ञान-चक्षु खुल गये थे। एक बार महाराणाने मीराका प्राण लेनेके लिए पिटारीमें बन्द कराकर एक विषधर सर्प भेजा। दासीने मीराके हाथमें सर्पकी पिटारी देते हुए कहा कि महाराणाने आपके लिए उपहार भेजा है। मीराने प्रसन्न होकर उस पिटारीको ले लिया और बड़े प्रेमसे उसे खोलकर सर्पको उठाते हुए कहा,—बड़ी सुन्दर माला है। इसे मैं अपने गिरिधरलालको चढ़ाऊँगी। भक्त-मीराके लिए वह सर्प मालाके रूपमें परिणत हो गया। जब यह समाचार महाराणाको मालूम हुआ तो वह बहुत क्रुद्ध हुए। सोचा, मीरा जादूगरनी है। इससे पहले भी वह मीराका प्राण लेनेके लिए कई उपाय कर चुके थे। यह निशाना चूक जानेपर उनके क्रोधकी सीमा न रही। वास्तवमें भावना बड़ी बलवान् वस्तु है। देखिये न, दृढ़ भावना और अभेददृष्टि ने सर्पको मालाके रूपमें परिणत कर दिया।

८—‘वनचर-ध्वज’—‘वन’ नाम ‘जल’ का है। जलमें चलनेवाला अर्थात् मकर है ध्वजपर जिसके; अर्थात् कामदेव।

९—‘वेदगर्भार्भकादभ्र...कर्ता’—एकबार सनकादिने अपने पिता ब्रह्मासे वेदान्तविषयक कुछ प्रश्न किया। सृष्टिके कार्यमें व्यस्त रहनेके कारण ब्रह्माजी शीघ्र उनके प्रश्नका उत्तर न दे सके। इससे सनकादिको अपने गुणका गर्व हुआ। ब्रह्माके स्मरण करते ही भगवान् विष्णु हंसका रूप धारण करके वहाँ प्रकट हो गये। उन्होंने तुरन्त ही सनकादिकका अभिमान चूर कर दिया। यही हंस भगवान् निम्बार्क सम्प्रदायके आदि आचार्य माने जाते हैं।

( ५५ )

देव— संत-संताप हर, विश्व विश्रामकर, राम कामारि, अभिरामकारी। सुद्ध बोधायतन, सच्चिदानन्दघन, सज्जनानंद-वर्धन, खरारी ॥१॥