विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका १११ संत निरपेच्छ, निर्मम, निरामय, अगुन, सब्द ब्रह्मौकपर, ब्रह्मज्ञानी । दच्छ, समदृक, स्वदृक, विगत अति खपर मति, परमरति विरति तव चक्रपानी ॥४॥ विश्व उपकारहित व्यग्र चित सर्वदा, त्यक्त मदमन्यु, कृत पुन्यरासी । यत्र तिष्ठन्ति तत्रैव अज सर्व हरि सहित गच्छन्ति छीराब्धिवासी ॥५॥ वेद-पयसिंधु, सुविचार मंदर महा, अखिल-मुनिवृंद निर्मथनकर्ता । सार सतसंगमुद्धृत्य इति निश्चितं वदति श्रीकृष्ण वैदर्भि भर्ता ॥६॥ सोक-संदेह, भय-हर्ष, तम-तर्षगन साधु-सद्युक्ति विच्छेदकारी । जथा रघुनाथ-सायक निसाचर-चमू- निचय-निर्दलन-पटु वेग भारी ॥७॥ यत्र कुत्रापि मम जन्म निज कर्मबस, भ्रमत जगजोनि संकट अनेकम् । तत्र त्वद्भक्ति-सज्जन, समागम, सदा भवतु मे राम विश्राममेकम् ॥८॥ प्रबल भव-जनित त्रैव्याधि-भैषज भगति, भक्त भैषज्यमद्वैत दरसी । संत-भगवंत अंतर निरंतर नहीं, किमपि मति मलिन कह दासतुलसी ॥९॥ शब्दार्थ—श्रीरंग = भगवान्का नाम है, वृन्दावनमें श्रीरंगजीका मन्दिर बहुत प्रसिद्ध है। भवदंघ्रि = (भवत्+अंघ्रि) आपके चरण। चापि = (च+अपि) और भी। अन्ने = दूसरे। त्रैवर्गपर = त्रिवर्ग यानी अर्थ, धर्म, कामसे परे। द्विज = अजामिल। निर्धूत = स्वच्छ, धुला हुआ। समदृक = समभावसे देखनेवाला। स्वदृक = आत्मदर्शी। मदमन्यु = अहंकार और