भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

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पृष्ठ 131

क्रोध। तिष्ठन्ति = रहते हैं। तत्रैव = वहीं। अज = ब्रह्मा। सर्व = शर्व, शिव। पय = दूध। उद्धृत्य = निकालकर। वैदर्भि = रुक्मिणी। भर्ता = पति। तर्पणन = वासनाएँ। चमू = सेना। भैषज्य = वैद्य। भावार्थ-हे देव श्रीरंगजी ! मुझ शरणागतको अपना अंग-स्वरूप सत्संग दीजिये, क्योंकि वह संसार-चक्रसे छुड़ानेवाला तथा शोकका हरनेवाला है। हे मुरारी ! जो लोग सदा आपके चरण-पल्लवके भरोसे रहते हैं और आपके चरणोंकी भक्तिमें रत रहते हैं, वे संशयमुक्त हो जाते हैं ॥१॥ दैत्य, देवता, नाग, मनुष्य, यक्ष, गन्धर्व, पक्षी, राक्षस, सिद्ध तथा और भी जितने दूसरे जीव हैं, वे सब सन्तोंके संसर्गसे अर्थ, धर्म, कामसे परे उस अप्राप्य परमपदको प्राप्त कर लेते हैं, जो केवल आपके ही प्रसन्न होनेपर मिलता है ॥२॥ वृत्रासुर, बलि, बाणासुर, प्रह्लाद, मय, धर्म नामक व्याध, गजेन्द्र, गिद्ध (जटायु) स्वधर्मत्यागी अजामिल, चांडाल, यवन आदि (पापी) सन्तोंके चरणोदकसे अपने सब पापों- को धोकर कैवल्य पदके अधिकारी हो गये ॥३॥ जो शान्त, निरपेक्ष (आकांक्षा- रहित), मोह-ममतारहित, काम-क्रोधरूपी रोगसे रहित, त्रिगुणरहित केवल शब्दब्रह्म अर्थात् वेदोंमें परायण और ब्रह्मज्ञानी हैं, जो (ज्ञान, भक्ति, वैराग्य आदिमें) कुशल समदर्शी, आत्मदर्शी या अपनी-परायी बुद्धिसे बिलकुल मुक्त हैं, हे चक्रपाणे ! जिनमें आपके प्रति परम भक्ति और संसारके प्रति विरक्तिका भाव है ॥४॥ जो संसारके उपकारार्थ सदा व्यग्र-चित्त हैं, मद और क्रोधको त्यागकर पुण्य-राशि हैं, ऐसे महात्मा जहाँ रहते हैं, वहीं ब्रह्मा और शिवके सहित क्षीर- सागरवासी भगवान् विष्णु पहुँच जाते हैं ॥५॥ चारों वेद दुग्ध-समुद्र हैं, उनका उत्तम विचार मन्दराचल पर्वत है और समस्त मुनियोंका समूह उसे मथनेवाला है। मथनेपर सत्संगरूपी सार (अमृत) निकला। यह सिद्धान्त रुक्मिणीपति भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं ॥६॥ साधुओंकी अच्छी युक्तियाँ शोक, सन्देह, भय- हर्ष, अज्ञान और वासनाओंको इस प्रकार विच्छिन्न कर देती हैं, जैसे रघुनाथजी- के बाण राक्षसोंकी सेनाके समूहको नष्ट करनेमें कुशल और महान् वेगवान हैं ॥७॥ हे देव श्रीरामजी ! अपने कर्मानुसार संसारकी अनेक संकटापन्न योनियोंमें घूमता हुआ जहाँ कहीं भी मेरा जन्म हो, वहाँ आपकी भक्ति और सन्तोंका समागम मुझे सदा प्राप्त हो; बस यही मेरा प्रधान विश्राम हो ॥८॥ घोर संसार