भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 126, कुल 475 में से

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पृष्ठ 126

विश्व-ब्रह्माण्डके अधीश्वर ! आपकी जय हो ॥६॥ आप मल-रहित, अविचल, कला-रहित, कलापूर्ण, कलिकालके तापसे तपे हुए प्राणियोंकी व्याकुलताका नाश करनेवाले तथा आनन्दकी राशि हैं। आप शेषनागके ऊपर सोते हैं, पूर्ण विक- सित कमलके समान नेत्रवाले हैं, क्षीरसागरमें रहते हैं तथा सबमें निवास करते हैं ॥७॥ सिद्धों, कवियों, और विद्वानोंको आनन्द देनेवाले आपके जो दोनों चरण हैं, वे पापी मनुष्योंके लिए अत्यन्त दुर्लभ हैं। जहाँसे (आपके जिन चरणोंसे) उत्पन्न होकर अत्यन्त पवित्र जलवती गंगाजी अपने दर्शनमात्रसे मनुष्यके सब पापोंको हर लेती हैं ॥८॥ आप नित्य, मुक्त, दिव्य गुण-युक्त, तीनों गुणोंसे रहित आनन्द-स्वरूप, षडैश्वर्यवान्, नियामक और सबपर शासन करनेवाले हैं। आप संसारका भरण-पोषण करनेवाले, विश्वके आदि कारण और आधार तथा शरणा- गत तुलसीदासके भयको हरनेवाले हैं ॥९॥

विशेष १—'अकल'—कला-रहित कहनेका यह अभिप्राय है कि परमात्मा (चन्द्रमा आदिकी तरह) घटते बढ़ते नहीं। २—'सकल'—कला-सहित कहनेका यह आशय है कि परमात्मा सोलहो कला युक्त अर्थात् पूर्ण तेज-स्वरूप हैं।

५६ ) देव— दनुजसूदन, दयासिन्धु, दम्भापहन, दहन, दुर्द्दोष, दुष्पापहर्त्ता । दुष्टतादमन, दमभवन, दुःखौघहर, दुर्ग दुर्वासना नासकर्त्ता ॥१॥ भूरिभूषन, भानुमंत, भगवंत, भव- भंजनाभयद, भुवनेसभारी। भावनातीत, भववंद्य, भवभक्तहित, भूमिउद्धरन, भूधरन-धारी ॥२॥

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