भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 125

११४ विनय-पत्रिका नित्य, निर्मुक्त, संयुक्त-गुन, निर्गुना- नंद, भगवंत, न्यामक, नियंता। विश्व-पोशन-भरन, विस्व-कारन-करन, सरन, तुलसीदास त्रास-हंता ॥९॥ शब्दार्थ—खङ्गकर = हाथमें तलवार। चर्मवर = श्रेष्ठ ढाल। वर्मधर = कवच धारण किये हुए। भर = अतिशय, सम्पूर्ण। सर्वरी = रात। तपन = तेज। तपरूप = तपोमय। तमपर = अविद्यासे परे। विवर्धन = विशेष वृद्धि करनेवाले। कोविद = विद्वान्। मंदात्म = पापी। दुराप = कठिनतासे प्राप्य। यत्र = जहाँसे। संभूत = उत्पन्न। दर्शनादेव = (दर्शनात् +एव) दर्शनसे अवश्यमेव। न्यामक = नियामक, कर्णधार, नियमोंके विधायक। नियंता = शासन करनेवाले। भावार्थ—हे देव श्रीराम! आप सन्तोंका सन्ताप हरनेवाले, विश्वको विश्राम देनेवाले तथा शिवजीको आनन्द देनेवाले हैं। आप शुद्ध-बुद्ध, सच्चिदा- नन्द घन हैं और साधुजनोंका आनन्द बढ़ानेके लिए खर नामक दैत्यके शत्रु हैं ॥१॥ हे राम, आप शील और समताके घर, वैषम्य बुद्धिके नाशक, लक्ष्मीके पति तथा रावणके शत्रु हैं। आप अपने हाथोंमें तलवार और सुन्दर ढाल लिये रहते हैं; आप कवच धारण किये हुए हैं तथा सुन्दर कमरमें तरकस कसे हुए हैं। आप बाण, शक्ति और धनुष धारण करनेवाले हैं ॥२॥ आप सत्य-संकल्प, मोक्षदाता, सबके हितकारी, सर्व-गुण-सम्पन्न तथा ज्ञान-विज्ञानशाली हैं। आपका नाम अज्ञानरूपी सघन अन्धकारसे पूर्ण घोर संसाररूपी रात्रिका नाश करनेके लिए प्रचण्ड किरणोंसे युक्त सूर्यके समान है ॥३॥ आप तीक्ष्ण तेजवाले, प्रबल एवं तीव्र दुःखोंके नाशक, राजाका शरीर धारण करनेपर भी तपस्याकी मूर्त्ति, अविद्यासे परे और तपस्वी हैं। आप मान, मद, काम, मत्सर, कामना और मोहरूपी समुद्रको मथनेके लिए मन्दराचल पर्वत हैं; आप मनस्वी भी हैं ॥४॥ आप वेदोंमें विख्यात, वरदायी देवताओंके स्वामी, वामन, विरक्त, निर्मल, सरस्वतीके अधी- श्वर, वैकुंठनाथ, काम-क्रोधादिके नाशक, क्षमाकी वृद्धि करनेवाले, शान्ति-मूर्त्ति और गरुडगामी हैं ॥५॥ आप परम पवित्र और पाप-पुंजरूपी मूँजके वनको अग्निके समान पलभरमें निर्मूल करनेवाले हैं। आप विश्व-ब्रह्माण्डके आभूषण, दूषण दैत्यके शत्रु, संसारके स्वामी, पृथिवीनाथ और वेदोंके मस्तक हैं। हे