भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 141

१३० विनय-पत्रिका दास तुलसी दीन धम-संबल हीन, श्रमित अति खेद, मति मोह नासी । देहि अवलंब न विलंब अंभोज-कर, चक्रधर तेजवल सर्मरासी ॥९॥

शब्दार्थ—पारायन = सम्पूर्णता, तत्पर । सदय = दयालु । माला = माला । मदन = कामदेव । अर्क = सूर्य । कुर्वन्ति = करते हैं । सक्र = इन्द्र । प्रत्यूह = विघ्न । प्रति = प्रत्येक । वक्र = टेढ़ । प्रमदा = स्त्री । तत्र = वहाँ । के = कौन, क्या । बराका = (वराक) गरीब । वय = हम । यष्टी = छड़ी, लाठी । पास = फन्दा । संबल = कलेवा, राह-खर्च । सर्म = (शर्म) कल्याण, सुख ।

भावार्थ—हे देव ! हे नर-नारायण ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ । आप ध्यान-परायण (अपने ही स्वरूपका ध्यान करते) हैं और ज्ञानके कारण हैं । आप समस्त संसारका हित करनेवाले, दयालु हृदयवाले, तपस्यामें लीन रहने- वाले और भक्तोंपर रहम करनेवाले हैं ॥१॥ आपके शरीरकी कान्ति नवीन नीले कमलके समान है, शोभा करोड़ों कामदेवके समान है और तेज अनन्त सूर्यके समान है । आपके नेत्र पूर्ण विकसित कमलके समान रमणीय हैं और सुन्दर मुखकी मुसकान चन्द्रमाकी किरणोंके सदृश है ॥२॥ आप सब प्रकारकी सुन्दरताके स्थान, अनन्त गुणनिधान और ब्रह्मा, वेद, पंडित तथा शिवजीके द्वारा सेवित होनेपर भी मान-रहित हैं । मुनि-वृन्दरूपी भौंरे आपके लाल कमलके समान चरणोंके मन्दाकिनीरूपी मकरन्दका पान करते हैं ॥३॥ आपने इन्द्रके भेजे हुए घोर कामदेवका मद चूर्ण किया है; आप क्रोध-रहित, ज्ञान-रत और ब्रह्मचारी हैं । हे प्रभो ! आपने बिना कल्पान्तके ही मार्कण्डेय मुनिको दिखानेके लिए प्रलयकरी लीला की थी ॥४॥ आप पवित्र वन, पर्वत और नदी-संयुक्त बदरिकाश्रममें सदैव पद्मासन लगाये एकरूपसे बैठे रहते हैं । आपका अत्यन्त अनुपम दर्शन सिद्ध, योगीन्द्र और देवताओंके लिए आनन्दप्रद और कल्याण- दायक है ॥५॥ हे भुवनेश्वर ! (आपके बदरिकाश्रमके मार्गमें 'मनभंग' और 'चित्तभंग' नामक पर्वत हैं जिन्हें देखकर बड़े-बड़े साहसी भी हिम्मत हारकर हिचकने लगते हैं) यहाँ अभिमान ही 'मनभंग' है, और मद, क्रोध, लोभादि, 'चित्तभंग' आदि दुर्गम पर्वत हैं । द्वेष, मत्सर और राग ही प्रबल विघ्न हैं और