विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका १२९ स्याम नव तामरस-दामद्युति वपुष, छवि- कोटि मदनार्क अगनित प्रकासं । तरुन रमनीय राजीव-लोचन ललित, वदन राकेस, कर-निकर हासं ॥२॥ सकल सौंदर्य-निधि, विपुल गुनधाम, विधि- वेद-बुध-संभु-सेवित, अमानं । अरुन पदकंज-मकरंद मंदाकिनी, मधुप-मुनिवृंद कुर्वन्ति पानं ॥३॥ सक्र-प्रेरित घोर मदन मद-भंगकृत क्रोधगत, बोधरत, ब्रह्मचारी । मारकंडेय मुनिवर्यहित कौतुकी, बिनहि कल्पांत प्रभु प्रलयकारी ॥४॥ पुन्य बन सैलसरि बदरिकाश्रम, सदा- सीन पद्मासनं, एक रूपं । सिद्ध-योगीन्द्र-वृन्दारकानन्दप्रद, भद्रदायक दरस अति अनूपं ॥५॥ मान मनभंग, चितभंग मद, क्रोध लोभादि पर्वत दुर्ग, भुवन-भर्त्ता । द्वेष-मत्सर-राग प्रबल प्रत्यूह प्रति, भूरि निर्दय, क्रूर-कर्म-कर्त्ता ॥६॥ विकटतर वक्र छुरधार प्रमदा, तीव्र दर्प कंदर्प खर खङ्गधारा । धीर-गंभीर-मन-पीर-कारक, तत्र के वराका वय विगत सारा ॥७॥ परम दुर्घट पंथ, खल-असंगत साथ, नाथ, नहिं हाथ वर विरति-यष्टी । दर्सनारत दास, त्रसित माया-पास, त्राहि हरि, त्राहि हरि, दास-कष्टी ॥८॥ ९