भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 142, कुल 475 में से

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सबके सब बड़े निर्दय एवं क्रूर कर्म करनेवाले हैं ॥६॥ यहाँ तीव्र-हृदया कामिनी ही अत्यन्त विकट और टेढ़ा क्षुरधार नामक पर्वत है, तथा कामका गर्व ही तीक्ष्ण 'खड्गधार' पर्वत है; जब कि ये सामग्रियाँ धीर और गम्भीर पुरुषोंके मनको पीड़ा पहुँचानेवाली हैं, तो फिर ब्रह्महीन और गरीब हम लोग वहाँ क्या चीज हैं ? ॥७॥ हे नाथ ! आपके दर्शनका मार्ग बहुत ही दुर्घट है, तिसपर खलोंका अनुचित साथ पड़ गया है, हाथमें (टेकने या सहारेके लिए वैराग्यरूपी छड़ी भी नहीं है। आपके दर्शनके लिए आर्त्त यह दास मायाके फन्देमें पड़ा दुःख पा रहा है। इस दुखी सेवककी रक्षा कीजिये प्रभो ! रक्षा कीजिये नाथ ! ॥८॥ दीन तुलसीदासके पास धर्मरूपी कलेवा भी नहीं है, वह बिलकुल थक गया है, दुःख भी बहुत है; मोहने उसकी बुद्धि भी हर ली है । हे चक्रपाणे ! हे तेज, बल और आनन्द-राशि ! देर न करके मुझे अपने कर-कमलोंका सहारा दीजिये ॥९॥ विशेष १—'नारायणं नरं'—नारायण नाम है विष्णुका । नार (जल) में जिसका घर हो उसे कहते हैं नारायण और 'नर' नाम है अर्जुनका । बदरिकाश्रममें ध्यानावस्थित नर नारायणकी प्रतिमा मौजूद है । २—'मार्कण्डेय' ऋषिकी उग्र तपस्या देखकर भगवान्ने प्रसन्न होकर उनसे वर माँगनेके लिए कहा । मार्कण्डेय मुनिने प्रलयका दृश्य देखनेकी इच्छा प्रकट की । परिणाम यह हुआ कि बिना कल्पान्तके ही भगवान्को प्रलय-लीला दिखानी पड़ी । ३—'मनभंग' या मानभंग, 'चित्तभंग', 'क्षुरधार' तथा 'खड्गधार' आदि पर्वत बदरिकाश्रमकी यात्राके मार्गमें पड़ते हैं । कई टीकाकारोंने इन शब्दोंका अर्थ करनेमें खूब अटकलसे काम लिया है । ( ६१ ) देव— सकल सुखकंद, आनंद वन पुन्यकृत, बिंदुमाधव द्वंद्व-विपतिहारी ।

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