विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३२ विनय-पत्रिका यस्यांघ्रिपाथोज अज-संभु-सनकादि, सुक- सेप, मुनिवृंद अलि निलयकारी ॥१॥ अमल मरकत स्याम, काम सतकोटि छवि, पीत पट तड़ित इव जलद नीलं। अरुन सतपत्र लोचन, बिलोकनि चारु, प्रनत जन-सुखद, करुनार्द्रसीलं ॥२॥ काल-गजराज-मृगराज, दनुजेस-वन- दहन पावक, मोह-निसि-दिनेसं। चारि भुज चक्र-कौमोदकी-जलद-दर, सरसिजोपरि जथा राजहंसं ॥३॥ मुकुट, कुंडल, तिलक, अलक अलिब्रात इव, भ्रुकुटि, द्विज, अधर वर, चारु नासा। रुचिर सुकपोल, दर ग्रीव सुख-सीव, हरि, इंदुकर-कुंदमिव मधुर हासा ॥४॥ उरसि वनमाल सुविसाल नव-मंजरी, भ्राज श्रीवत्स-लांछन उदारं। परम ब्रह्मन्य, अति धन्य, गतमन्यु, अज, अमित बल, विपुल महिमा अपारं ॥५॥ हार केयूर, कर कनक कंकन रतन— जटिल मनि-मेखला कटि प्रदेसं। युगल पद नूपुरामुखर कलहंसवत् , सुभग सर्वांग सौंदर्य वेसं ॥६॥ सकल सौभाग्य-संयुक्त त्रैलोक्य, श्री दच्छि दिसि रुचिर वारीस-कन्या। वसत विवुधापगा निकट तट सदन वर, नयन निरखंति नर तेऽति धन्या ॥७॥ अखिल मंगल-भवन, निविड़संसय समन, दमन-वृजनाटवी, कष्टहर्त्ता।