विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 144, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका १३३ विश्वधृत, विश्वहित, अजित, गोतीत, सिव, विश्वपालन-हरन, विश्वकर्त्ता ॥८॥ ज्ञान-विज्ञान वैराग्य-ऐश्वर्य-निधि, सिद्धि अणिमादि दे भूरि दानं । ग्रसित-भव व्याल अति त्रास तुलसीदास, त्राहि श्रीराम उरगारि-यानं ॥९॥ शब्दार्थ-यस्यांघ्रि = (यस्य + अंघ्रि) जिसके चरण । निलय = निवास । मरकत = नीलमणि । सतपत्र = शतदल कमल । आद्र = भीगे हुए। पावक = अग्नि । दिनेस = सूर्य । कौमोदकी = गदा । दरु = शंख । सरसिजोपरि = (सरसिज + उपरि) कमलके ऊपर । अलिब्रात = भ्रमर-समूह । द्विज = दाँत । लांछन = चिह्न । ग्रीव = गर्दन । ब्रह्मन्य = ब्राह्मणोंका सम्मान करनेवाले । मन्यु = क्रोध । केयूर = विजायठ । मेखला = करधनी । मुखर = शब्दायमान । कल = सुन्दर । सुभग = सुन्दर । दच्छि = दक्षिण । वारीस = कन्या लक्ष्मी । वृजनाटवी = (वृजन + अटवी) पापरूपी वन । भावार्थ-हे देव विन्दुमाधव, आप सब तरहका सुख बरसानेवाले मेघ हैं, आनन्दवन (काशी) को पवित्र करनेवाले तथा राग-द्वेषादि द्वन्द्वात्मक विपत्तियों- को हरनेवाले हैं। आपके चरण-कमलोंमें ब्रह्मा, शिव, सनकादि, शुकदेव, शेष और मुनिरूपी भौंरे निवास करते हैं ॥१॥ आप निर्मल नीलमणिके समान श्यामल हैं, आपकी छवि सैकड़ों करोड़ कामदेवके समान है; आपका पीताम्बर नीले बादलमें बिजलीके समान है। आपके नेत्र लाल रंगके शतदल कमलके समान हैं; उन नेत्रोंकी सुन्दर चितवन भक्तोंको सुखी करनेवाली और करुणाईशील है ॥२॥ आप कालरूपी हाथीके लिए सिंह हैं, राक्षसरूपी वनको जलानेके लिए अग्नि हैं, मोह-निशाको दूर करनेके लिए सूर्य हैं। आपके चारों हाथोंमें शंख, चक्र, गदा और पद्म हैं। आपके हाथमें शंख तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे कमलके ऊपर राजहंस ॥३॥ मस्तकपर मुकुट, कानोंमें मकराकृत कुण्डल, माथेपर तिलक, भौंरोंके समूहके समान अलकें (लटें), बाँकी भौंहें, सुन्दर दाँत तथा ओठ, सुन्दर नासिका, मनोहर कपोल और शंखके समान ग्रीवा ये सब मानो सुखकी सीमा हैं। हे भगवन् ! आपका मधुर हास चन्द्रकिरण एवं कुन्द-पुष्पके समान है ॥४॥ आपके हृदयपर नव-मंजरी-सहित विशाल वनमाला है और श्रीवत्सका सुन्दर