भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 154, कुल 475 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 154

विनय-पत्रिका १४३ राग-भैरव

राम राम रमु¹, राम राम रटु, राम राम जपु जीहा । रामनाम नव नेह-मेह को, मन ! हठि होहि पपीहा ॥१॥ सब साधन-फल कूप-सरित-सर, सागर-सलिल निरासा । रामनाम-रति-स्वाति-सुधा-सुभ, सीकर प्रेमपियासा ॥२॥ गरजि, तरजि, पाषान वरषि पवि, प्रीति परखि जिय जानै । अधिक अधिक अनुराग उमँग उर, पर परमिति पहिचानै ॥३॥ रामनाम-गति, रामनाम-मति, रामनाम-अनुरागी । ह्वै गये, हैं, जे होहिंगे त्रिभुवन² तेइ गनियत बड़भागी ॥४॥ एक अंग मग अगमु गवन करि, बिलमु न छिन-छिन छाहैं । तुलसी हित अपनो अपनी दिसि, निरुपाधि नेम निबाहैं ॥५॥

शब्दार्थ-जीहा = जीभ । मेह = बादल । हठि = जबर्दस्ती । बूँद = बूँद । पवि = वज्र । परमिति = पराकाष्ठा । बिलमु = विलम्ब, विभोर होना ।

भावार्थ-हे जीभ ! तू राम राममें रम जा, राम राम रट और राम राम जप । हे मन ! तू रामनाममें प्रेमरूपी नवीन-मेघके लिए जबर्दस्ती पपीहा बन जा ॥१॥ तू अन्य सब साधनोंके फलरूपी कूप, नदी, तालाब और समुद्रके जलकी आशा न रखकर केवल रामनामकी भक्तिरूपी स्वातीकी अमृततुल्य कल्याणकारी बूँदके लिए प्रेमका प्यासा बन जा । अर्थात् जैसे पपीहा, कूप, नदी आदिके जलकी परवाह न करके स्वातीके जलके लिए लालायित रहता है, वैसे ही हे मन, तू भी और सब साधनोंके फलकी आशा छोड़कर रामनाममें लीन होनेके लिए प्रेमकी प्यास लगा ॥२॥ पपीहेका प्रेमी मेघ गरजकर, डाँट बतलाकर तथा पत्थर और वज्र बरसाकर उसके प्रेमको परखता है, उसके बाद वह अपने दिलमें उसे समझकर पहचान लेता है कि पपीहेके हृदयानुरागकी उमंग अत्यन्त अधिक है, चरम सीमाको भी पार कर गयी है ॥३॥ इसी प्रकार तू भी (कष्टोंकी ओर ध्यान

१. पाठान्तर 'रटु' । २. पाठान्तर 'होहिंगे आगे' ।