विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४२ विनय-पत्रिका रागादि-सर्पगन-पन्नगारि । कंदर्प नाग मृगपति, सुरारि ॥६॥ भव-जलधि-पोत चरनारविंद । जानकी-रवन आनंद-कंद ॥७॥ हनुमंत-प्रेम-बापी-मराल । निष्काम कामधुक गो दयाल ॥८॥ त्रैलोक-तिलक, गुन-गहन राम । कह तुलसिदास विश्राम धाम॥९॥ शब्दार्थ—निसेस = (निशा + ईश) चन्द्रमा । अनंग = कामदेव । मारतंड = सूर्य । गहन = वन । सुर-रंजन = देवताओंको सुख देनेवाले । कंदर्प = काम । नाग = हाथी । पोत = नौका । बापी = बावली । भावार्थ—मैं करुणा-निधान श्रीरघुनाथजीकी बन्दना करता हूँ, जिससे मेरा सांसारिक भेद-ज्ञान जाता रहे ॥१॥ वह रघुवंश-रूपी कुमुद-पुष्पके लिए सुखप्रद चन्द्रमा हैं; ब्रह्मा और शिव उनके चरणारविन्दकी सेवा किया करते हैं ॥२॥ वह अपने भक्तोंके हृदय-कमलके भ्रमर हैं। उनके शरीरका लावण्य अगणित कामदेवोंके समान है ॥३॥ वह अत्यन्त प्रबल मोहान्धकारको दूर करनेके लिए सूर्यरूप, तथा अविद्यारूपी वनको भस्म करनेके लिए प्रचण्ड अग्नि- रूप हैं ॥४॥ वह अभिमानरूपी समुद्रको सोख जानेके लिए उदार अगस्त्य ऋषि हैं, तथा देवताओंको सुखी करनेके लिए पृथिवीका भार उतारनेवाले हैं ॥५॥ वह राग-द्वेषादि रूपी साँपोंके लिए गरुड, कामदेवरूपी हाथीके लिए सिंह तथा मुर नामक दैत्यके शत्रु हैं ॥६॥ उनके चरणारविन्द संसार-सागरसे पार उतारनेके लिए नौकारूप हैं । वह जानकी-वल्लभ हैं और आनन्दकी वर्षा करनेवाले हैं ॥७॥ वह हनुमान्जीकी प्रेम-बावलीके हंस, तथा भक्तोंकी इच्छाएँ पूरी करनेके लिए निष्काम कामधेनुके समान दयालु हैं ॥८॥ तुलसीदास कहते हैं कि वह श्रीरामजी त्रिलोकके शिरोमणि, गुणोंके वन तथा शान्तिके स्थल हैं ॥९॥ विशेष १—'भव भेद ग्यान'—'यह मेरा है, वह तेरा है' 'मैं बड़ा हूँ, वह छोटा है' यही संसारका भेदात्मक ज्ञान है । २—इस पदतक वन्दना करनेके बाद गुसाईंजी अब आगेके पदसे विनय प्रारम्भ करेंगे ।