भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 152

विनय-पत्रिका १४१ मनुष्यको) दीन, मलीन और सुख-रहित होकर करोड़ों जन्मतक भरम-भरमकर भटकना पड़ता है, मरना और जन्म लेना लगा रहता है ॥९॥ विशेष १—'तजि सुभाव'—मनका स्वभाव स्वाभाविक ही चंचल है। नैय्या- यिकोंने मनके गुणके सम्बन्धमें 'अपरत्वं, परत्वं, संख्या, वेगश्च' इत्यादि लिखा है। गीतामें अर्जुनने भगवानसे कहा है:— 'चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम् । तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥' मन इतना अधिक चंचल है, इसीसे गोस्वामीजीने केवल पलभर देखनेके लिए कहा है। क्योंकि यह चपल मन पहले पलभर तो स्थिर रहकर प्रभुकी ओर देख ले, अधिक देरतक देखना तो बहुत दूरकी बात है। २—'नख दुति'—श्रीमद्भागवतमें भगवान्के पदारविन्दके वर्णनमें नख- द्युतिकी अनूठी झलक दिखाई पड़ती है। ३—'त्रिवली' पर किसी कविने कहा है— कैधौं मैनभूपतिके रथके सुचक्र चले दिन ही की लीकँ उर भूपै जान तौन है। कैधौं मैन ठगकी गली ये भली ठगिबेकी कैधौं रूपनदी ह्वै तिधार कियो गौन है॥ ऐसी छवि देखी एरी मोहे मनमोहन जू यातें मैंहू जानी येही मोहबेको भौन है। एक बली सबहीको बस करि राखत है त्रिबली जो करै बस अचरज कौन है ॥ राग-बसन्त ( ६४ ) बंदौं रघुपति करुना-निधान। जाते छूटै भव-भेद-ग्यान ॥१॥ रघुवंस-कुमुद-सुखप्रद निसेस। सेवत पद-पंकज अज-महेस ॥२॥ निज भक्त-हृदय-पाथोज-भृंग। लावन्य बपुष अगनित अनंग॥३॥ अति प्रवल मोह-तम-मारतंड। अग्यान-गहन-पावक प्रचंड ॥४॥ अभिमान-सिंधु-कुंभज उदार। सुर-रंजन, भंजन भूमिभार ॥५॥